दीपक रस्तोगी
ट्रंप प्रशासन ने भारत पर एकीकृत संचार प्रणाली विकसित करने और रक्षा तथ्यों के आदान-प्रदान को लेकर संधियों पर दस्तखत के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया है। बुधवार देर रात अमेरिका के रक्षा सचिव जिम मैटिस ने रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर के साथ बातचीत में 2004 में प्रस्तावित इन संधियों को लेकर दबाव बनाया। इन प्रस्तावों पर नौसेना और वायुसेना आपत्ति जताती रही है। ताजा कवायद में रक्षा बलों ने यह कहते हुए आगाह किया है कि इससे सैन्य प्रणाली में अमेरिकी दखल बढ़ेगा। गोपनीय सूचनाओं तक अमेरिकी तंत्र की पहुंच बन जाएगी। अमेरिका ने भारत से सैन्य सहयोग बढ़ाने के नीतिगत फैसले पर आगे बढ़ने के लिए वर्ष 2004 में चार मूलभूत संधियों का प्रस्ताव रखा था। इनमें से एक ‘एंड यूजर वेरिफिकेशन एंड मॉनिटरिंग एग्रीमेंट (एयूवीएमए)’ पर मनमोहन सिंह सरकार के जमाने में दस्तखत हो गए। इसके तहत युद्धाभ्यास, प्रशिक्षण, मानवीय मदद और आपदा राहत के मामले में एक-दूसरे की फौज को आपूर्ति, लॉजिस्टिक सहयोग और हथियारों से सहयोग बढ़ाने का प्रावधान किया गया। पिछले साल अगस्त में नरेंद्र मोदी सरकार ने दूसरी संधि ‘लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम आॅफ एग्रीमेंट (एलएएमए)’ पर दस्तखत किए। इसके तहत भारत और अमेरिका के बीच साजो-सामान मुहैया कराने के लिए सहयोग बढ़ाने की बात है। इसे भारत और अमेरिका के बीच बड़ी रक्षा सहमति माना जा रहा है। इस संधि के तहत अमेरिकी सेना को भारत में आधार तैयार करने की छूट मिल जाएगी।
फिलहाल, रक्षा मंत्रालय के अधिकारी एलएएमए को लेकर भुगतान और लेखा प्रावधान की शर्तों पर काम कर रहे हैं कि अगर भारत का लड़ाकू विमान किसी अमेरिकी आधार शिविर से तेल भराएगा तो उसे किस मुद्रा में भुगतान करना होगा। अगर अमेरिकी सैनिकों को भारतीय आधार शिविर से भोजन की आपूर्ति की जाए तो क्या होगा। अमेरिकी आधार शिविर की अनुमति देने के सवाल पर ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) गुरमीत कंवल कहते हैं कि यह ठीक है कि सेनाओं के बीच सहयोग बढ़ेगा, लेकिन हमें हमारी स्वायत्तता का सवाल भी देखना होगा। आने वाले वर्षों में रक्षा खरीद की नीति को अमेरिका के हिसाब से तय करने की मजबूरी हो जाएगी।
बाकी दो प्रस्ताव- ‘कम्युनिकेशंस कॉम्पैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट (सीसीसीए)’ और ‘बेसिक एक्सचेंज एंड कोआॅपरेशन एग्रीमेंट (बीएसीए)’ को लेकर अमेरिका उत्सुक है। इसके तहत दोनों तरफ की फौजों को एकीकृत संचार का नेटवर्क बनाना होगा। अमेरिका और भारतीय लड़ाकू विमानों के सेंसर और अन्य उपकरणों से जमा की गई जानकारी और आंकड़े एक दूसरे से साझा करने होंगे। बीएसीए पर दस्तखत होने के बाद किसी भी जगह की जानकारी एक-दूसरे से बांटनी होगी। तर्क दिया जा रहा है कि दोनों देशों की सैन्य संचार प्रणाली एक-साथ मिलकर काम करेगी और वैश्विक खतरों से निपटेगी। लेकिन रक्षा विशेषज्ञ और रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान के डॉ गोविंद बालाचंद्रन जैसे जानकारों का मानना है कि इससे भारतीय सैन्य प्रणाली में दखल सौ फीसद हो जाएगा। अमेरिका कभी भी गोपनीय उपकरण भारत से मांग सकता है।
डोनाल्ड ट्रंप सरकार ने दलील दी है कि बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में चीन का दखल बढ़ रहा है। चीन ने पाकिस्तान और बांग्लादेश में दखल बढ़ाया है। ऐसे में हिंद महासागर में चीनी पनडुब्बियों पर नजर रखने के लिए दोनों संधियां जरूरी हैं। इस बारे में अमेरिका की प्रशांत महासागरीय कमान के प्रमुख एडमिरल हैरिस की रिपोर्ट भारत सरकार को भेजी गई है। इसमें पनडुब्बी रोधी भारत के विमान पी8आइ में उपकरण बदलकर अमेरिकी पी8ए की तरह बनाने का प्रस्ताव है, ताकि संचार और डेटा शेयरिंग की जा सके।


