बयान देने की जल्दी
सीलिंग रुकवाने के लिए दिल्ली के मास्टर प्लान में प्रस्तावित संशोधन को सुप्रीम कोर्ट ने मानने से इनकार कर दिया है। इससे रिहायशी इलाकों में हो रही सीलिंग रुकने की संभावना भी कम हो गई है। कहा जा रहा है कि संशोधन की प्रक्रिया पूरी न होने से सुप्रीम कोर्ट को उसे न मानने का आधार मिल गया। यह भी कहा जा रहा है कि केंद्रीय शहरी विकास मंत्री की हर मुद्दे पर बयान देने की जल्दबाजी भी समस्या का कारण बन रही है। डीडीए बोर्ड की बैठक होने से पहले ही मंत्री ने प्रस्तावित संशोधन की जानकारी सार्वजनिक कर दी। जबकि होना यह चाहिए था कि पहले डीडीए बोर्ड की बैठक हो और अगर उसमें कोई कमी रह जाए तो उसे शहरी विकास मंत्रालय ठीक करवाए। इससे पहले भी वे मेट्रो के किराए बढ़ाए जाने पर तरह-तरह के बयान देकर अपनी पार्टी को फंसा चुके हैं। वहीं सीलिंग न रुकने का ठीकरा सभी दल एक-दूसरे पर फोड़ने में लगे हैं, लेकिन मास्टर प्लान में उचित संशोधन से सीलिंग रुकती भी तो उसका राजनीतिक लाभ भाजपा को ही मिलता, जोकि अफरा-तफरी में नहीं मिला। आने वाले दिनों में सीलिंग का दायरा बढ़ता दिख रहा है क्योंकि अब तो सुप्रीम कोर्ट की निगरानी समिति नगर निगम से अनधिकृत निर्माण भी सील करवाने लगी है।

सुकून की सड़क
सालों तक धरना प्रदर्शन का केंद्र रही जंतर-मंतर के सामने वाली सड़क पर अब लोग नहीं दिखते, गाड़ियां दिखती हैं। इससे आंदोलन करने वाले परेशान हैं। वहीं आंदोलन के दौरान भोजन-पानी से लेकर टेंट-दरी तक का इंतजाम करने वालों का धंधा भी मंदा पड़ गया है। इलाके के दुकानदारों की बिक्री भी कम हो गई है। हालांकि 24 घंटे जंतर-मंतर से लेकर संसद मार्ग पर बैरियर लगाकर चौकस रहने वाले पुलिसकर्मी अब तनावमुक्त हो गए लगते हैं। इन सब में इलाके में गाड़ियां लाने वाले लोगों की मौज हो गई हैै। पहले उन्हें अपनी गाड़ियां इस इलाके में खड़ी करने के लिए कई तरह के पापड़ बेलने पड़ते थे, लेकिन अब तो पूरी सड़क ही अघोषित पार्किंग बन गई है और लोग सुकून से गाड़ियां खड़ी कर रहे हैं।

एकता में फूट
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के निवास पर दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश की कथित पिटाई को लेकर सरकार के खिलाफ एकजुट हुए दिल्ली सरकार के अधिकारियों व कर्मचारियों की एकता में अब फूट पड़ने लगी है। हालांकि ज्यादातर अधिकारी और कर्मचारी अभी भी सरकार के विरोध के फैसले पर कायम हैं, लेकिन कुछ अधिकारी अब सरकार की वकालत भी करने लगे हैं। आलम यह है कि कर्मचारियों के एक गुट ने अपने ही नेता को बाहर का रास्ता दिखा दिया है तो दूसरी ओर उस नेता को बाहर निकालने का आदेश जारी करने वाले नेता को ही बाहर कर दिया गया है। आपसी भिड़ंत से कुछ हो न हो यह संदेश तो जा ही रहा है कि मुख्य सचिव की प्रतिष्ठा के लिए एकजुट कर्मचारी अब आपस में ही भिड़ रहे हैं। ऐसी चर्चा है कि इनको लड़ाने में पर्दे के पीछे सरकार से जुड़े लोग भी शामिल हैं। जिस नेता को लेकर कर्मचारियों के बीच फूट की नौबत आई, वे कुछ दिन पहले तक तो मुख्यमंत्री की मुखालफत कर रहे थे, लेकिन सरकार के एक मंत्री के साथ वे मुख्यमंत्री आवास पर पहुंच गए। वहां मुख्यमंत्री ने उन्हें खास करीबी बताकर पूछ लिया कि आखिर उनको मोर्चा खोलने की क्या जरूरत थी। बस, उसके बाद से उनका मन बदल गया। उन्होंने अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ ही झंडा उठा लिया। उनका कहना है कि देश में अन्य जगह भी अधिकारियों के साथ बदसलूकी हुई है, लिहाजा मुख्य सचिव से अभद्रता को राष्टÑीय परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए।

खुराक से ब्रेकफास्ट मंत्री
दिल्ली में जब शीला दीक्षित की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार थी, तब राजधानी में होने वाले पार्टी के किसी भी जलसे में खाने-पीने का इंतजाम सरकार के ही एक खास मंत्री के जिम्मे हुआ करता था। उनके सामने न सही, लेकिन पीठ पीछे लोग मजाक में उनको खुराक मंत्री भी कहते थे। कहीं पर भी भोजन का इंतजाम हो तो यह माना जाता था कि खास मंत्री ने ही सारा इंतजाम किया होगा। लेकिन दिल्ली में हुकूमत बदलने के बाद कांग्रेस में भी समीकरण बदल गए हैं। अब पार्टी के तीन दिन के महाधिवेशन में भोजन का इंतजाम पूर्वी दिल्ली से ताल्लुक रखने वाले एक कद्दावर विधायक को सौंप दिया है जबकि दीक्षित के जमाने में खुराक मंत्री कहे जाने वाले नेताजी को इस बार चाय-नाश्ते का जिम्मा सौंपे जाने की चर्चा है। इस तब्दीली पर पार्टी जनों के बीच चुटकी भी ली जा रही है कि वक्त बदले तेवर देखिए कि खुराक मंत्री को ब्रेकफास्ट मंत्री बना दिया।

कशमकश में पुलिस
सीलिंग के मुद्दे पर हो रही किरकिरी से दिल्ली पुलिस की साख को बड़ा झटका लगा है। लाजपत नगर में सीलिंग के विरोध पर व्यापारियों और कुछ मीडियावालों के साथ पुलिस ने जिस तरह का बर्ताव किया उसकी हर जगह आलोचना हो रही है। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में निगम की ओर से चलाए जा रहे सीलिंग अभियान में पुलिस सुरक्षा बल मुहैया कराती है। मामला चूंकि सुप्रीम कोर्ट से जुड़ा है, लिहाजा पुलिस इसमें आनाकानी नहीं कर सकती। लेकिन सीलिंग का विरोध कर रहे व्यापारियों पर इस तरह बेरहमी से लाठीचार्ज करने को भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। वहीं पुलिस अधिकारी कुछ भी बोलने से कतराते हुए सिर्फ यही कह रहे हैं कि हमारे तो एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई है।

चालान से हलकान
पौने दो साल पहले नोएडा के दो प्रमुख रास्तों- उद्योग मार्ग और हरौला मार्ग को एकल मार्ग किया गया था। प्रशासनिक सख्ती के चलते शुरुआती महीनों में इन रास्तों से लोगों को हटाकर जानकारी देने के लिए बड़े-बड़े बोर्ड लगाए गए थे, लेकिन सख्ती में छूट मिलते ही रास्तों पर न केवल रेहड़ी-पटरीवालों ने कब्जा कर लिया है, बल्कि यहां धड़ल्ले से गाड़ियां भी खड़ी की जा रही हैं। वन-वे की जानकारी देने वाले बोर्ड भी उखड़ चुके हैं, लेकिन इन सबके बीच पुलिसवालों के अच्छे दिन आ गए हैं क्योंकि इन एकल रास्तों पर उल्टी दिशा से आने वाली गाड़ियों से उन्हें जुर्माना जो वसूलने को मिल जाता है। दिल्ली से आने वाले अनजान लोग जब इन चौड़ी सड़कों पर दूसरी दिशा में वाहन ले जाते हैं, तो वहां सादे या वर्दी में तैनात यातायात पुलिसकर्मी उनके कुछ बोलने से पहले ही चालान थमा देते हैं। -बेदिल