कंप्यूटर की निगरानी के बारे में हालिया प्रावधानों को लेकर मचे सियासी बावेला के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने रविवार को इस बारे में सफाई दी है। गृह मंत्रालय ने कहा कि केंद्र सरकार ने किसी भी जांच एवं प्रवर्तन एजंसी को इस बारे में ‘पूर्ण शक्ति’ नहीं दी है। अपनी कार्रवाई में जांच एजंसियों को मौजूदा नियमों का ही पालन करना होगा। इसके तहत उन्हें हर बार पूर्व मंजूरी लेनी होगी। गृह मंत्रालय के बयान के मुताबिक, ‘आइटी एक्ट, 2000 में पर्याप्त कदम उठाए गए हैं और टेलीग्राफ एक्ट में भी मिलते-जुलते प्रावधान हैं। हर मामले में गृह मंत्रालय एवं राज्य सरकारों से पूर्व मंजूरी की जरूरत होगी। गृह मंत्रालय ने किसी भी कानून एवं प्रवर्तन एजंसी को विशेष अधिकार नहीं दिए हैं।’
गृह मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि कंप्यूटर से जानकारी निकालने (इंटरसेप्ट) को लेकर कोई नया नियम-कानून, नई प्रक्रिया, नई एजंसी, पूर्ण शक्ति या पूर्ण अधिकार जैसा कुछ नहीं है। जांच एवं प्रवर्तन एजंसियों के लिए नियमों में कोई फेरबदल नहीं किया गया है। गृह मंत्रालय ने 20 दिसंबर की अधिसूचना में 10 एजंसियों का नाम जारी किया था और कहा था कि उन एजंसियों को कंप्यूटर की हर तरह की निगरानी का अधिकार दिया गया है। इस अधिसूचना पर विपक्ष ने सरकार पर निगरानी राज्य बनाने की कोशिश करने का आरोप लगाया था। गृह मंत्रालय के मुताबिक, अधिसूचना में बताई गई दस एजंसियों को 2011 से इलेक्ट्रॉनिक संचारों को बीच में रोककर जानकारी हासिल करने के अधिकार पहले से ही थे। मंत्रालय ने 2011 की ‘आदर्श परिचालन प्रक्रियाओं’ को दोहराया, जिसमें कहा गया कि इस तरह के हर ‘इंटरसेप्ट’ के लिए संबंधित प्राधिकार (केंद्रीय गृह सचिव या राज्य गृह सचिव) से पूर्व मंजूरी की जरूरत होगी।
मंत्रालय ने 10 एजंसियों- खुफिया ब्यूरो, नॉरकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग, राजस्व खुफिया निदेशालय, केंद्रीय जांच ब्यूरो, राष्ट्रीय जांच एजंसी, रॉ, डायरेक्टोरेट ऑफ सिग्नल इंटेलिजेंस (जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर और असम) एवं दिल्ली पुलिस के नामों की सूची जारी की है। इन एजंसियों को आइटी एक्ट, 2000 की धारा 69 के तहत कंप्यूटर से जानकारी निकालने और निगरानी के अधिकार दिए गए थे। अधिकारी ने कहा कि एजंसियों की सूची टेलीकॉम सेवा प्रदाताओं को भेजने के लिए तैयार की गई थी। यह सुनिश्चित किया गया कि सिर्फ अधिकृत एवं पदेन एजंसी ही संचार पर निगरानी करे और इस प्रावधान का बेजा इस्तेमाल न हो सके।
यूपीए के वक्त बने थे नियम
सरकार का कहना है कि कंप्यूटर डेटा हासिल करके जानकारी लेने और इसकी निगरानी करने के नियम 2009 में उस समय बनाए गए थे, जब कांग्रेस नीत यूपीए सत्ता में थी और उसके नए आदेश में केवल उन एजंसियों के नाम बताए हैं, जो इस तरह का कदम उठा सकती हैं।
अधिकार पहले से ही थे
गृह मंत्रालय के मुताबिक, अधिसूचना में बताई गई दस एजंसियों को 2011 से इलेक्ट्रॉनिक संचारों को बीच में रोककर जानकारी हासिल करने के अधिकार पहले से ही थे। मंत्रालय ने 2011 की ‘आदर्श परिचालन प्रक्रियाओं’ को दोहराया, जिसमें कहा गया कि ऐसे हर ‘इंटरसेप्ट’ के लिए संबंधित प्राधिकार (केंद्रीय गृह सचिव या राज्य गृह सचिव) से पूर्व मंजूरी की जरूरत होगी।
निगरानी मामलों में कमी आई है
गृह मंत्रालय के मुताबिक 2014 की तुलना में निगरानी के मामलों में गिरावट आई है, जबकि देश में मोबाइल फोन कनेक्शन बढ़कर लगभग 120 करोड़ हो गए हैं। इस लिहाज से इलेक्ट्रॉनिक संदेशों की संख्या में भी तेजी से बढ़ोतरी हुई है। उपभोक्ता बढ़े हैं, जबकि निगरानी में काफी गिरावट आई है।
