जम्मू-कश्मीर सरकार ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि उनके यहां पहले से दो आयोग मौजूद हैं जो लोकपाल और लोकायुक्त कानून का पूरा काम करते हैं। ऐसे में राज्य में लोकायुक्त की कोई जरूरत नहीं है। राज्य सरकार ने न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति आर भानुमति और न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा के पीठ को बताया कि जम्मू-कश्मीर जवाबदेही आयोग कानून 2002 और जम्मू-कश्मीर राज्य सतर्कता आयोग कानून 2011 के प्रावधान लोकायुक्त कानून 2013 के समान ही हैं।
इस पर पीठ ने कहा कि आपके यहां समानांतर व्यवस्था (जवाबदेही आयोग) है। उसकी अध्यक्षता अवकाशप्राप्त मुख्य न्यायाधीश करते हैं। दो अवकाशप्राप्त न्यायाधीश उसके सदस्य हैं। आपके यहां सतर्कता आयोग भी है। आपका कहना है कि दोनों आयोग पर्याप्त हैं। आपका कहना है कि आपके संविधान की विलक्षणता को देखते हुए लोकायुक्त की जरूरत नहीं है। जम्मू-कश्मीर सरकार के वकील शोएब आलम से पीठ ने कहा- हम नहीं जानते हैं कि आपका जवाबदेही आयोग या सतर्कता आयोग किस हद तक काम करता है और क्या वह लोकायुक्त कानून के मानदंडों पर खरे उतरते हैं।
इसके जवाब में आलम ने कहा कि राज्य के जिन कानूनों के तहत दोनों आयोगों का गठन हुआ है, वे लोकायुक्त कानून के समान हैं। अपनी दलील की पुष्टि के लिए उन्होंने लोकायुक्त कानून के प्रावधान 63 का हवाला भी दिया। प्रावधान 63 में कहा गया है कि हर राज्य सार्वजनिक कर्मचारियों के भ्रष्टाचारों की शिकायत सुनने के लिए इस कानून के लागू होने के एक साल के भीतर अपने यहां लोकायुक्त नामक संस्था का गठन करे, यदि राज्य की विधानसभा से पारित कानून के तहत उनके यहां पहले से लोकायुक्त संस्था का गठन नहीं किया गया है। लोकायुक्तों और लोकपाल की नियुक्ति को लेकर याचिका दायर करने वाले वकील अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि जम्मू-कश्मीर का जवाबदेही आयोग और सतर्कता आयोग लोकायुक्त कानून के मानदंडों पर खरा नहीं उतरता है। इस पर पीठ ने सवाल किया- आप बताएं कि क्या फर्क है।
पीठ ने कहा कि वह जम्मू-कश्मीर सरकार की रखी गई दलीलों को भी सुनेगी। साथ ही पीठ ने उपाध्याय से कहा कि वह लोकायुक्त कानून और राज्य के दोनों कानूनों का तुलनात्मक अध्ययन कर सकते हैं। सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी कहा कि यदि जम्मू-कश्मीर राज्य के दोनों कानून लोकायुक्त कानून के समान ही हैं तो यह फिर नाम बदलने का मामला रह जाएगा। जम्मू-कश्मीर के अलावा पीठ ने पश्चिम बंगाल, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, तमिलनाडु, तेलंगाना और ओड़ीशा सहित 11 अन्य राज्यों में भी लोकायुक्तों की नियुक्ति के मुद्दे पर सुनवाई की। इससे पहले अदालत ने इन 11 राज्यों के मुख्य सचिवों से कहा था कि वे लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं किए जाने के कारणों से उसे अवगत कराएं।

