साल 2002 में होली के बाद की सुबह जब बिहार का बाकी हिस्सा धीरे-धीरे जाग रहा था तब सारण जिले के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक कुंदन कृष्णन, उनके बॉडीगार्ड जितेंद्र सिंह और तत्कालीन स्थानीय थाना अधिकारी अर्जुन लाल ने एक खतरनाक फैसला लिया। एक ऐसा निर्णय जिसमें मानक पुलिस प्रोटोकॉल का उल्लंघन किया गया और जो राज्य के इतिहास का हिस्सा बन गया।
छपरा जेल परिसर की ऊंची दीवारों को फांदकर आईपीएस अधिकारी, कांस्टेबल और सब-इंस्पेक्टर प्रशासनिक भवन की छत पर उतरे। अंदर जेल में विद्रोह का माहौल था। कैदी दंगा कर रहे थे और उन्होंने जेल प्रशासन को बाहर निकाल दिया था। उन्होंने बंद लोहे के मुख्य द्वार को गैस सिलेंडरों से भरकर बम में बदल दिया था ताकि अधिकारियों को अंदर आने से रोका जा सके।
जेल की दीवार फांदकर अंदर पहुंचे अधिकारी
बिहार पुलिस के वर्तमान महानिदेशक (संचालन) कुंदन कृष्णन ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया , “कैदियों ने बंद गेट के पीछे सिलेंडर जमा कर रखे थे ताकि बाहर से गैस कटर से काटने की कोई भी कोशिश करने पर विस्फोट हो जाए। रास्ता साफ करने का कोई और तरीका नहीं था। यह केवल अंदर से ही किया जा सकता था इसलिए हमें दीवार फांदनी पड़ी।”
कुंदन कृष्णन को छपरा ऑपरेशन के लिए वीरता पदक
इसके लगभग 24 साल बाद, गणतंत्र दिवस 2026 पर कुंदन कृष्णन को छपरा ऑपरेशन में उनकी भूमिका के लिए वीरता पदक से सम्मानित किया गया है। उनके साथ ही अर्जुन लाल, जो पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) के रूप में सेवानिवृत्त हुए और जितेंद्र सिंह जो वर्तमान में पटना में एक सब-इंस्पेक्टर के रूप में कार्यरत हैं, को भी सम्मानित किया गया।
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छपरा जेल में घेराबंदी
28 मार्च 2002 को पांच कुख्यात अपराधियों को अन्य जेलों में स्थानांतरित करने के आदेश के बाद जेल में अशांति फैल गई। तीन दिनों तक 1200 कैदियों ने परिसर को बंधक बनाए रखा। देसी बमों और जब्त किए गए हथियारों से लैस होकर कैदियों ने परिसर पर कब्जा कर लिया, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया और कर्मचारियों पर हमला किया। उन्होंने जेल को एक किले में बदल दिया, पेड़ों और छतों पर चढ़कर पास आने वाले किसी भी व्यक्ति पर पत्थर और बम बरसाए।
कृष्णन ने याद करते हुए बताया, “बिहार मिलिट्री पुलिस (बीएमपी) की एक बैरक को तोड़ा जा रहा था। जब भी हम फायर इंजन की सीढ़ी का इस्तेमाल करके दीवार के ऊपर से देखने की कोशिश करते, वे हम पर पत्थर और तार वाले बम फेंकते थे।”
काटी गयी जेल की पानी और बिजली
कैदियों को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर करने के लिए पानी और बिजली की आपूर्ति काट दी गई थी लेकिन प्रशासन और स्थानीय नेताओं द्वारा दो दिनों की बातचीत और प्रयासों के बावजूद गतिरोध समाप्त नहीं हो सका। अधिकारी ने बताया कि जैसे ही विद्रोह की खबर फैली, देश भर से पत्रकार छपरा पहुंच गए जबकि जेल के बाहर कैदियों के रिश्तेदारों ने सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंके। 30 मार्च तक बिहार सरकार का धैर्य समाप्त हो चुका था और कुंदन कृष्णन को जेल का कंट्रोल वापस लेने का जिम्मा सौंपा गया था। कृष्णन ने बताया कि हर तरफ से दबाव था, यह करो या मरो की स्थिति थी।
कुंदन कृष्णन का प्लान
आईपीएस अधिकारी ने योजना बनाई थी और आगे बढ़कर हमला करने का फैसला किया था। रणनीति यह थी कि कैदियों का ध्यान और सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर करने के लिए एक साथ तीन अलग-अलग जगहों से जेल में प्रवेश किया जाए ताकि कम से कम एक टीम दरवाजा खोल सके। हालांकि, दो टीमें प्रवेश पाने में असमर्थ रहीं। कृष्णन ने बताया, “अन्य टीमें निर्धारित दो स्थानों से चढ़ाई नहीं कर सकीं।” उन्होंने आगे कहा, “उस समय मैंने फैसला किया कि हम खुद ही अंदर जाएंगे। आप इसे लापरवाही भरा या साहसी कह सकते हैं लेकिन उस समय उस स्थिति से निकलने का कोई और रास्ता नहीं था।”
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एक कार्बाइन से लैस और केवल लाल और सिंह के साथ, कृष्णन प्रशासनिक ब्लॉक से होते हुए प्रांगण में पहुँच गए। तत्काल सहायता के अभाव में और 1,000 से अधिक दंगा कर रहे कैदियों से घिरे होने के बावजूद, तीनों ने बैरिकेड लगे गेट से गैस सिलेंडरों को हाथ से खींचकर दूर किया जिससे बाहर मौजूद गैस काटने वाली मशीन के लिए प्रवेश द्वार को काटने का रास्ता साफ हो गया।
बाल-बाल बचे थे आईपीएस कृष्णन
जैसे ही बाकी पुलिस बल मौके पर पहुंचा, उसके बाद चार घंटे तक भीषण संघर्ष चला जिसमें पुलिस ने दंगाइयों को तितर-बितर करने और जेल तोड़ने की कोशिश को रोकने के लिए आंसू गैस, हथगोले और आत्मरक्षा में गोलीबारी का इस्तेमाल किया। धुआं छंटने और परिसर को सुरक्षित किए जाने के बाद जेल में हथियार, .315 बोर कारतूस और कच्चे बमों के अवशेष बिखरे पड़े थे। इस अभियान में सात कैदी और 28 पुलिसकर्मी घायल हुए थे जबकि चार कैदियों की मौत हो गई थी। कृष्णन ने हंसते हुए याद किया, “एक पत्थर मेरी उंगली पर लगा और हड्डी टूट गई। फिर एक बम फटा जिससे मेरा जूता मेरे पैर से उड़ गया था।”
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