सोशल मीडिया के इस्तेमाल में दिल्ली सरकार सबको पीछे छोड़ चुकी है। तकनीक के इस स्वरूप का जितना इस्तेमाल केजरीवाल और उनकी पार्टी करती है, शायद ही कोई और करता हो। दिल्ली को संपूर्ण राज्य का दर्जा देने के मसले को साझा करना हो, पार्टी के किसी नेता के पिता की मृत्यु पर संवेदना जताना हो, विपक्ष पर हमला करना हो या सम-विषम पार्ट-2 को सफल करार देना हो, हर काम के लिए माइक्रोब्लॉगिंग साइट का जमकर इस्तेमाल हो रहा है। इसके लिए उन्हें न तो किसी पब्लिसिटी सेल की जरूरत है, न ही सूचना अधिकारियों की। ट्विटर और वॉट्सएप के माध्यम से मुख्यमंत्री, मंत्री, नेतागण जनता और मीडिया से सीधे मुखातिब तो होते हैं, लेकिन आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करने वाली दिल्ली सरकार कई जमीनी दिक्कतों का उपाय निकालने में विफल दिख रही है।

अपने मुंह मियां मिट्ठू
दिल्ली सरकार की चर्चित सम-विषम योजना इस बार भले ही फेल मानी जा रही हो, लेकिन मुख्यमंत्री केजरीवाल और उनकी पार्टी की नजर में यह पूरी तरह से सफल रही है। तभी तो परिवहन मंत्री गोपाल राय कहते हैं कि मीडिया के एक वर्ग के पूर्वाग्रह से प्रेरित प्रचार के बावजूद सम-विषम सफल रहा है। सरकार पिछली बार की तरह इस बार भी अभियान की सफलता पर चार मई को छत्रसाल स्टेडियम में समारोह करके जश्न मनाएगी। हालांकि स्कूल आॅफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सम-विषम से न तो सड़कों पर वाहनों की संख्या कम हुई और न ही प्रदूषण कम हुआ। हर महीने इस अभियान को चलाने की घोषणा भले ही टाल दी गई हो, लेकिन केजरीवाल को जानने वालों को पता है कि लोग चाहे जो कहें वे अपने किए को ही सही मानेंगे।ट

केजरीवाल के दावे
आम आदमी पार्टी (आप) और उसके नेता शुरू से ही अन्य दलों से अलग होने का दावा करते रहे हैं। आम धारणा है कि राजनीतिक दल ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने के लिए ज्यादा जगहों पर चुनाव लड़ना चाहते हैं, जिससे उनकी पार्टी की लोकप्रियता बढ़े। केजरीवाल ने दूसरी बार आप का संयोजक बनने के जश्न में कहा कि उनकी पार्टी वहीं चुनाव लड़ेगी जहां उसे नब्बे फीसद सीटें जीतने का भरोसा है। वे दिल्ली के बाद पंजाब में भी वैसे ही नतीजे दिलाने वाले हैं। 14 फरवरी को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हुए उन्होंने कहा था कि वे दिल्ली से बाहर नहीं जाएंगे, लेकिन लोकसभा चुनाव में पंजाब में मिली सफलता ने उनके इरादे बदल दिए। अब वे पंजाब में विधानसभा चुनाव लड़कर वहां पैठ जमाने की कोशिश कर रहे हैं। अगला नंबर गोवा का है। अगर यही रफ्तार रही तो अगला लोकसभा चुनाव लड़कर केजरीवाल का प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा हो जाएगा।

नाकामी का ठीकरा
स फलता का सेहरा अपने सिर और विफलता का ठीकरा दूसरों के सिर। केजरीवाल सरकार इसी तर्ज पर चल रही है। 30 अप्रैल को खत्म हुए सम-विषम पार्ट-2 के लिए परिवहन मंत्री की प्रतिक्रिया कुछ ऐसी ही थी। सम-विषम खत्म होने के दो दिन पहले एक संवाददाता सम्मेलन में परिवहन मंत्री ने कहा कि इस बार मीडिया की भूमिका काफी नकारात्मक रही, शुरू से ही मीडिया योजना को पास-फेल के तराजू पर तौलती रही। मंत्री जी का तो यहां तक कहना था कि सम-विषम पार्ट-2 को योजनाबद्ध तरीके से विफल करने की कोशिश की गई, मीडिया के माध्यम से नकारात्मक खबरें जनता के सामने आर्इं। मंत्री जी शायद भूल जाते हैं कि विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी की अभूतपूर्व सफलता में मीडिया की भी भागीदारी थी। फिर मीडिया को योजना विशेष से क्या गुरेज होगा, वह तो समाज का चेहरा दिखाने का दर्पण मात्र है। दिल्ली सरकार को मीडिया को कोसने के बजाए परिवहन व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए कोई दूरगामी योजना लेकर आनी चाहिए।

जेएनयू और आंदोलन
जेएनयू में दाखिले से लेकर परीक्षा तक की सूचना गायब है। तीन महीने से खबर बन रही है तो केवल आंदोलन की! कन्हैया, कन्हैया और कन्हैया! छात्र तो छात्र, विश्वविद्यालय भी इसे ही चर्चा में रख रहा है। मसलन नौ महीने बाद किसी मामले में नोटिस भेज दिया गया। तो महीनों पड़ी रिपोर्ट पर अचानक कार्रवाई कर दी गई। किसी ने ठीक ही कहा है, कैंपस में केवल और केवल आंदोलन की चर्चा है। नया एपिसोड है- मुजफ्फरनगर अभी बाकी है!

ज्ञान का बखान
राजधानी की आबोहवा की फिक्र इन दिनों यहां की फिजाओं में घुली हुई है। हर जगह सम-विषम पर चर्चा हो रही है। कोई इसे कोस रहा है तो कोई तारीफ कर रहा है। जो तारीफ कर रहे हैं वो दिल्ली में पाल्यूशन फ्री हवा तो चाह रहे हैं, लेकिन कार खड़ी कर एक दिन भी बस या मेट्रो की शरण लेना उनके बूते का नहीं। इसकी एक बानगी बेदिल को भी देखने को मिली। एम्स के पास कुछ अमीरजादे लग्जरी कार का एसी चलाने के लिए इंजन स्टार्ट करके खड़े थे। कार का गेट भी खुला था और किसी अन्य साथी का इंतजार हो रहा था। गाड़ी के नंबर से चर्चा शुरू होकर साफ हवा पर ज्ञान बघारने तक पहुंच गई। समाधान बताया गया कि इस हफ्ते एक डीजल कार और ली गई विषम नंबर की तब काम चला। साफ हवा की वकालत सभी कर रहे थे, लेकिन एक ने भी डीजल गाड़ी का एसी बंद करने या कार की बजाए मेट्रो से जाने की इच्छा जताना तो दूर इसकी बात तक नहीं की जबकि मेट्रो का गेट सामने ही था।
-बेदिल

दाखिले की दरकार
राजधानी में पिछले दिनों स्कूली दाखिले की मारामारी चल रही थी। सरकार सभी बच्चों को स्कूली शिक्षा अनिवार्य रूप से देने व समान शिक्षा का इंजताम करने की वकालत कर रही थी। काम के सिलसिले में घर से निकलने पर पता चला कि गली के मोड़ पर स्थित सरकारी स्कूल में भीड़ जमा थी। मामला जानने की गरज से पूछा तो पता चला कि नाम न आने की वजह से दो तीन बच्चों के अभिभावक परेशान थे। गरीब तबके के ये लोग नजदीक की त्रिलोकपुरी पुनर्वास कालोनी के थे। इन बच्चों की मांएं घरों में काम करके गुजारा करती हैं। बच्चों को पढ़ाने का सपना देखने वाली ये मांएं दाखिले की सूची में अपने बच्चे का नाम न होने से हैरान-परेशान गेट पर खड़ी थीं। कहां जाएं क्या करें, समझ नहीं पा रही थीं और स्कूल के गेट पर नारा लिखा था, सभी पढ़ें सभी बढ़ें-शिक्षा हमारा कानूनी अधिकार।

फरमान की नाफरमानी
तू डाल-डाल, मैं पात-पात। यह कहावत इन दिनों दिल्ली पुलिस पर सटीक बैठ रही है। नए पुलिस आयुक्त जहां पुलिसिया कार्यशैली को बदलने और भ्रष्टाचारी पुलिसवालों पर लगाम लगाने का फरमान जारी कर रहे हैं वहीं उनके मातहत उन्हीं के फरमान को धता बताते हुए अपनी कारिस्तानी से बाज नहीं आ रहे हैं। बीते एक महीने के अंदर दिल्ली पुलिस के करीब एक दर्जन पुलिसवालों को रंगदारी, भ्रष्टाचार और अन्य गंभीर मामलों में आरोपित किया जा चुका है। इनमें द्वारका और साउथ कैंपस थाने के छह पुलिसवालों को बर्खास्त किया जा चुका है, लेकिन शुक्रवार को तीस हजारी कोर्ट परिसर में हुई वारदात, जिसमें एक महिला ने खुदकुशी के लिए विजय विहार थाने के एसएचओ को जिम्मेदार बताया, ने इंतहा कर दी। हालांकि पुलिस आयुक्त ने फौरन कार्रवाई करते हुए एसएचओ दिनेश कुमार को गिरफ्तार करने और बर्खास्त करने के निर्देश दिए, लेकिन बीते महीने जिस तरह एक के बाद एक पुलिस वालों की गिरफ्तारी और अन्य विभागीय कार्रवाई हुई है उससे साफ है कि आयुक्त के फरमान का पुलिसवालों को न तो कोई डर है और न चिंता।

प्रचार का प्रताप
दिल्ली नगर निगम के एक मेयर के बारे में इन दिनों चर्चा है कि जनाब, पूर्व हो गए पर प्रचार से बाज नहीं आ रहे। जब मेयर थे तो उनके आकस्मिक दौरे और अन्य रटी-रटाई खबरेंं मिलती थीं। वे औचक निरीक्षण करते तो दर्जनों फोटो प्रचार के लिए भेजे जाते। स्थिति यहां तक पहुंच गई थी कि केंद्रीय मंत्री, सांसद, विधायक और नगरमंत्री भी कोई उद्घाटन या शिलान्यास करते, तो उस नाम पट्टिका में मेयर का नाम जरूर होता था। एक सप्ताह भी नहीं हुआ जब वे पूर्व हो गए, लेकिन पूर्व होने से क्या हुआ? वे अपने कार्यकाल के दौरान लिए गए फैसले और उस पर हुई कार्रवाई का प्रचार अब भी कर रहे हैं।