दिल्ली उच्च न्यायालय ने मेट्रो में महिलाओं के लिए मुफ्त सफर के केजरीवाल सरकार के प्रस्ताव को चुनौती देने वाली याचिका बुधवार (10 जुलाई) को खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि किसी खास वर्ग को छूट देने का फैसला करना प्राधिकार का काम है। मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति सी हरिशंकर की पीठ ने याचिका को विचारार्थ स्वीकार करने से यह कहकर इनकार कर दिया कि इसमें कोई दम नहीं है।
याचिकाकर्ता पर लगा जुर्मानाः इतना ही नहीं कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया जिसे चार सप्ताह के भीतर जमा करना होगा। अदालत ने याचिकाकर्ता की उस अपील को भी खारिज कर दिया, जिसमें किराया कम करने और टिकट की कीमत मौजूदा छह स्लैब की बजाय 15 स्लैब में करने का अनुरोध किया गया था।
‘किराया जनहित याचिका में तय नहीं हो सकता’: पीठ ने कहा, ‘किराया तय करना वैधानिक प्रावधान है और यह लागत समेत कई कारकों पर निर्भर करता है जिसे एक जनहित याचिका में निर्धारित नहीं किया जा सकता।’ इसने कहा कि याचिकाकर्ता वकील बिपिन बिहारी सिंह किराया तय करने में कोई अवैधता बताने में नाकाम रहे हैं और अदालत दिल्ली मेट्रो के लिए किराया तय में ‘अत्यंत धीमी’ रहेगी क्योंकि यह कार्य सरकार का अधिकार है।
अगले वर्ष प्रस्तावित विधानसभा चुनावों से पहले आप सरकार ने जून में घोषणा की थी कि उसका दिल्ली में महिलाओं के लिए मेट्रो और बस यात्रा मुफ्त करने का प्रस्ताव है ताकि महिलाएं सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल के प्रति प्रोत्साहित हो सकें। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि दिल्ली सरकार महिलाओं का यात्रा खर्च वहन करेगी।
अदालत ने कहा कि दिल्ली मेट्रो के किराये से संबंधित दो याचिकाएं पहले भी दायर की जा चुकी हैं और उन्हें भी विचारार्थ स्वीकार नहीं किया गया पीठ ने कहा कि वह कोई निर्देश देने की इच्छुक नहीं है। दिल्ली सरकार के वकील संजय घोष ने पीठ को जानकारी दी कि याचिका समय पूर्व दायर की गई है क्योंकि फिलहाल महिलाओं को मेट्रो में यात्रा में कोई छूट नहीं दी जा रही है और प्रस्ताव अब भी विचाराधीन है। इस मामले में गौरांग कंठ ने केन्द्र सरकार का प्रतिनिधित्व किया।

