जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में जल्द ही एक फैमिली फूड कोर्ट खुलने जा रहा है, जहां पर विद्यार्थी, शिक्षक और कर्मचारी अपने परिवार के साथ खाने का लुत्फ उठा सकेंगे। इसके अलावा जेएनयू परिसर में कई जगहों पर छोटे-छोटे फूड कोर्ट शुरू किए जाएंगे। परिसर में ढाबे पहले की तरह ही चलते रहेंगे। जेएनयू के रजिस्ट्रार प्रमोद कुमार ने बताया कि हमारे विश्वविद्यालय में अभी ऐसा स्थान नहीं है जहां परिवार के साथ जाकर खाना खाया जा सके। इसी बात को ध्यान में रखते हुए एक फैमिली फूड कोर्ट खोलने का विचार बनाया गया है। इसके लिए आइआरसीटीसी, मैक्डोनाल्ड या हल्दीराम जैसी बड़ी रेस्तरां शृंखलाओं से बात की जाएगी। उन्होंने बताया कि इसके अलावा जेएनयू की 277वीं कार्यकारी परिषद (ईसी) की मंगलवार को हुई बैठक में परिसर में कई स्थानों पर फूड कोर्ट शुरू करने का भी निर्णय किया गया। इसके लिए सबसे पहले स्थानों का चयन किया जाएगा। उन्होंने बताया कि इन फूड कोर्ट में देश के सभी हिस्सों में मिलने वाला खाना उपलब्ध होगा। इससे विद्यार्थियों को अधिक विकल्प के साथ बेहतर और साफ खाना मिल सकेगा। इतना ही नहीं ये स्थान उनके मिलने जुलने के केंद्र के रूप में भी विकसित होंगे।
रजिस्ट्रार के मुताबिक ईसी ने परिसर में मौजूद ऐसी कैंटीनों के खिलाफ उपयुक्त कार्रवाई करने का निर्णय लिया है जो न तो नियमों को पालन कर रही हैं और न ही विद्यार्थियों को साफ और सस्ता खाना उपलब्ध करा रही हैं। ईसी ने कैंटीन के लिए नई निविदा जारी करने का भी फैसला किया है और इस प्रक्रिया में वे कैंटीन मालिक शामिल नहीं हो सकेंगे जिनके खिलाफ जेएनयू ने कार्रवाई की हो। इसके अलावा मुख्य पुस्तकालय के एक रीडिंग कमरे अग्नि सुरक्षा की व्यवस्था करने के लिए उसे बंद करने का फैसला किया। पुस्तकालय में अन्य सुविधाएं जारी रहेंगी।
रजिस्ट्रर में उपस्थिति का दर्ज होना जारी रहेगा: ईसी को बताया गया कि विश्वविद्यालय में उपस्थिति दर्ज करने के लिए बायोमैट्रिक तंत्र लगा दिया गया है लेकिन अभी चालू नहीं है। जब तक यह तंत्र चालू नहीं हो जाता है तब तक रजिस्ट्रर में उपस्थिति का दर्ज होना जारी रहेगा। परिसर में फूड कोर्ट खोलने के निर्णय पर जेएनयू छात्र संघ का कहना है कि इससे जेएनयू की ढाबा संस्कृति खत्म होगी। इसके अलावा बड़े-बड़े रेस्तरां को परिसर में अपने फूड कोर्ट खोलने की इजाजत दी जाएगी जिससे छोटे-छोटे दुकानदारों का नुकसान होगा।
डूटा ने लंबित मांगों को लेकर डीयू में किया प्रदर्शन: दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) ने शिक्षकों की लंबित मांगों को लेकर मंगलवार को उत्तरी परिसर स्थित कला संकाय पर प्रदर्शन किया। शिक्षकों ने नियुक्तियों और पदोन्नति को लेकर डीयू प्रशासन से सवाल पूछे। दूसरी ओर, शिक्षकों से जुड़ी कई मांगों को लेकर नेशनल डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट (एनडीटीएफ) के सदस्यों ने डीयू के कुलपति को पत्र लिखकर 26 नवंबर को डीयू में धरना देने की बात कही है।
डूटा के अध्यक्ष राजीब रे ने कहा कि डीयू प्रशासन की ओर से विश्वविद्यालय की वैधानिक निकायों (विद्वत परिषद और कार्यकारी परिषद) को लेकर समय पर बैठकों का आयोजन नहीं किया जा रहा है। साथ ही त्रिपक्षीय समझौते के सिलसिले में भी शिक्षकों की मांगों को नहीं माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि प्रशासन की ओर से शिक्षकों की संशोधित पेंशन और भत्ता जल्द जारी किया जाए, यही हमारी मांग है। डूटा के सदस्यों ने कहा कि हाल ही में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के अधिनियमों को लागू करने के लिए एक समिति का गठन हुआ था। इस समिति की ओर से यह सिफारिश की गई थी कि तदर्थ शिक्षिकाओं को मातृत्व अवकाश दिया जाए। इसकी समिति के सदस्यों ने एकमत से विद्वत परिषद (एसी) की बैठक में मामलों को पास करने के लिए भी कहा था लेकिन इस मामले में प्रशासन की ओर से एसी की बैठक नहीं बुलाई गई। शिक्षकों ने आरोप लगाया कि पिछले दो सालों से विद्वत परिषद और कार्यकारी परिषद की बैठकों को काफी समय के अंतराल के बाद किया जा रहा है। पहले ऐसा नहीं होता था।

