मानहानि के एक केस में सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को लताड़ लगाई हैै। कोर्ट ने उन्हें चेतावनी देते हुए कहा कि या तो खेद जताइए या फिर मुकदमे का सामना कीजिए। मानहानि के एक केस में सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को लताड़ लगाई हैै। कोर्ट ने उन्हें चेतावनी देते हुए कहा कि या तो खेद जताइए या फिर मुकदमे का सामना कीजिए।
कोर्ट ने यह टिप्पणी राहुल गांधी के एक बयान पर दायर मानहानि के मामले की सुनवाई करते हुए की। उन्होंने महात्मा गांधी की हत्या के लिए आरएसएस को जिम्मेदार ठहराया था। कोर्ट ने कहा कि राहुल गांधी को इस बात का सबूत देना होगा कि यह बयान जनहित में दिया गया। केस का फैसला इसी मेरिट पर होना चाहिए कि यह बयान आम लोगों के हित में था या नहीं। कोर्ट ने कहा कि आप पूरे संगठन को इस तरह बदनाम नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी को इस मामले में 27 जुलाई तक विस्तार से अपना पक्ष रखने के लिए कहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी राहुल गांधी को बयान पर खेद जता कर मामले को खत्म करने का सुझाव दिया था। उन्होंने यह सुझाव मानने से इंकार कर दिया था। राहुल गांधी ने कहा था कि वह इस मामले का सामना करेंगे। पिछले साल नंवबर में न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति प्रफुल्ल सी पंत की पीठ ने कहा था कि हमें लगता है कि इस मामले को शालीन तरीके से खत्म किया जा सकता है और मानहानि के मामले को निपटाया जा सकता है। राहुल गांधी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा था कि वह मामले में बहस करना पसंद करेंगे। राहुल ने कथित तौर पर चुनाव प्रचार के दौरान एक भाषण में महात्मा गांधी की हत्या के लिए आरएसएस को जिम्मेदार ठहराया था। इस बयान के विरोध में कई जगह उनके खिलाफ याचिकाएं दायर की गई हैं।
एक मामला ठाणे के भिवंडी कोर्ट में भी पहुंचा था। सुप्रीम कोर्ट ने इस कोर्ट में राहुल गांधी के खिलाफ चल रहे आपराधिक मानहानि के मुकदमे की सुनवाई पर फिलहाल रोक लगाई हुई है। राहुल गांधी ने इस केस को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक मानहानि कानून को चुनौती दी थी। उन्होंने अपने खिलाफ दायर अवमानना का मुकदमा रद्द करने की भी अर्जी दी थी। पर यह अर्जी हाईकोर्ट में खारिज हो गई। तब वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। राहुल ने आरएसएस कार्यकर्ता राजेश कुंटे द्वारा महाराष्ट्र के ठाणे जिले के भिवंडी में मजिस्ट्रेट की अदालत के समक्ष दायर याचिका को रद्द करने की मांग की थी। इसे बॉम्बे हाई कोर्ट ने दस मार्च को खारिज कर दिया था।

