बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए ने 200 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की है। इस जीत का एक बड़ा संकेत साफ है—महिलाओं के लिए शुरू की गई जनकल्याण योजनाएं निर्णायक साबित हुई हैं। यह बात भी साबित होती है कि कैश ट्रांसफर स्कीमें वास्तविक लाभ देती हैं।
एक बार के लिए मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना और दूसरी इज्जत योजना को फ्रीबी कहकर नजरअंदाज किया जा सकता है, लेकिन सच यह है कि इस योजना के तहत लगभग 75 लाख महिलाओं को 10,000 रुपये दिए गए। यह पैसा सितंबर के आखिर में ट्रांसफर कर दिया गया था। साथ ही यह वादा भी किया गया कि आगे चलकर और अधिक आर्थिक सहायता मिलेगी। यदि लाभार्थी अपने क्षेत्र में अच्छी प्रगति दिखाएंगी, तो उन्हें 2 लाख रुपये तक अतिरिक्त सहायता दी जा सकती है। यह राशि एक बार के लिए काफी है, लेकिन लंबी अवधि में और जरूरी कदम उठाने की जरूरत होगी।
कैश ट्रांसफर योजनाओं का क्या फायदा?
जून 2025 के ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन की शोधकर्ता सुनेना कुमार बताती हैं कि यदि छोटे लेकिन लक्षित कैश ट्रांसफर महिलाओं को दिए जाएं, तो वे कई समस्याओं से बेहतर तरीके से निपट पाती हैं। इससे वे अपने घर का बेहतर ध्यान रख पाती हैं, खाद्य सुरक्षा में सुधार दिखता है, बच्चों की शिक्षा बेहतर होती है और बचत भी बढ़ती है। दूसरे शब्दों में, महिलाएं अधिक सशक्त महसूस करती हैं।
सुनेना कुमार आगे कहती हैं कि यह सच है-सिर्फ कैश ट्रांसफर किसी भी परिवार को पूरी तरह गरीबी से बाहर नहीं ला सकता। यदि किसी देश को इनक्लूसिव ग्रोथ चाहिए और गरीबी से मुक्ति पानी है, तो कैश ट्रांसफर के साथ-साथ मजबूत सोशल प्रोटेक्शन सिस्टम, बेहतर रोजगार अवसर, शिक्षा और स्किल डेवलपमेंट पर भी बल देना होगा। और इनमें महिलाओं पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। अभी के लिए मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना महिलाओं के रोजगार बढ़ाने की पहल है, लेकिन केवल कुछ हजार रुपये देने से उद्देश्य पूरा नहीं होगा।
महिला रोजगार की असली तस्वीर
मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन (MoSPI) के ताजा डेटा के अनुसार बिहार में महिलाओं का लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट (LFPR) राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। बिहार का LFPR—8.8% जबकि देश का औसत—21.4% है। यह देश में सबसे कम है। दूसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश है, जबकि सबसे बेहतर स्थिति हिमाचल प्रदेश की है।
अगर 15 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को देखें, तब भी बिहार का LFPR मात्र 20.6% है, जबकि राष्ट्रीय औसत 33.7% है। ये आंकड़े उन महिलाओं के हैं जो नौकरी खोज रही हैं, लेकिन सवाल यह है कि जो महिलाएं काम कर भी रही हैं, वे किस सेक्टर में हैं? डेटा बताता है कि बिहार में 77.8% महिलाएं कृषि क्षेत्र में काम कर रही हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 59.1% है। वहीं, बिहार में सेकेंडरी सेक्टर में केवल 7.3% महिलाएं रोजगार में हैं।
बेरोजगारी की चुनौती
बिहार की चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि यहां बेरोजगारी की दर ऊंची है। कम उम्र की महिलाओं में बेरोजगारी दर 20.7% है, जबकि राष्ट्रीय औसत 17% है। शहरी क्षेत्रों में तो महिला बेरोजगारी दर 52.3% है—जो भारत के औसत से दोगुनी है।
इंडस्ट्री और सर्विस सेक्टर-दोनों कमजोर
नौकरियां बढ़ाने के लिए उद्योगों का होना जरूरी है। एनुअल सर्वे ऑफ इंडस्ट्रीज़ के अनुसार, बिहार में अभी सिर्फ 3386 फैक्ट्रियां हैं—जो देश की कुल फैक्ट्रियों का मात्र 1.3% है।
सिर्फ उद्योग ही नहीं, बिहार का सर्विस सेक्टर भी सिकुड़ रहा है। MoSPI का डेटा बताता है कि सर्विस सेक्टर का योगदान घट रहा है, जिससे रोजगार के अवसर और सीमित हो रहे हैं। इसी वजह से माना जा रहा है कि महिलाओं को केवल कैश ट्रांसफर देने से न इंडस्ट्रियल सेक्टर सुधरेगा, न सर्विस सेक्टर और न ही रोजगार की स्थिति में बड़ा बदलाव आएगा।
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