महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने रविवार को बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के नवनिर्वाचित शिवसेना सदस्यों से बातचीत के बाद कहा कि मुंबई को महायुति का मेयर मिलेगा। महायुति गठबंधन के सहयोगी दल, भाजपा और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना, इस महत्वपूर्ण पद को लेकर आपस में खींचतान में उलझे हुए हैं। हालांकि, शहर को तुरंत मेयर नहीं मिलेगा। इसका कारण यह भी है कि मेयर का चुनाव एक अलग कानूनी प्रक्रिया द्वारा संचालित होता है जो नई विधानसभा के औपचारिक रूप से गठित होने के बाद ही शुरू होती है।

महापौर का चुनाव पार्षदों द्वारा किया जाता है और यह पद आरक्षण के अंतर्गत आता है। जब तक लॉटरी के माध्यम से यह आरक्षण तय नहीं हो जाता और आधिकारिक रूप से नोटिफिकेशन जारी नहीं हो जाता, तब तक राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित नहीं कर सकते। ऐसे में मुंबई को इस हफ़े महापौर मिलने की संभावना कम है।

क्या है मेयर पद के लिए आरक्षण प्रणाली?

देश भर के अधिकांश शहरी स्थानीय निकायों के कानून के अनुसार, महापौर का पद अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और महिलाओं के लिए बारी-बारी से आरक्षित होना चाहिए। यह आरक्षण पहले से तय नहीं होता। इसके बजाय, शहरी विकास विभाग द्वारा आयोजित लॉटरी के माध्यम से इसका निर्णय किया जाता है। इस लॉटरी के पूरा होने और केटेगरी की आधिकारिक घोषणा के बाद ही मेयर के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। ऐसे में मतगणना पूरी होने के बाद भी मुंबई को महापौर मिलने में कई दिन लग सकते हैं।

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आरक्षण तय करने के लिए लॉटरी क्यों?

लॉटरी के ज़रिए प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाए रखने का प्रयास किया जाता है। लॉटरी के जरिए अधिकारी इस आरोप से बचते हैं कि राजनीतिक दल या सरकारें अपने हितों के लिए आरक्षण में हेरफेर कर रही हैं। लॉटरी के माध्यम से बारी-बारी से चुने जाने से यह भी सुनिश्चित होता है कि विभिन्न सामाजिक समूहों को समय-समय पर महापौर पद पर बैठने का मौका मिले न कि किसी एक वर्ग को बार-बार लाभ मिलता रहे।

मेयर पद रोटेशन के आधार पर आरक्षित क्यों है?

महापौर पद के लिए आरक्षण की व्यवस्था 74वें संवैधानिक संशोधन से उत्पन्न हुई। इसके तहत शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा दिया और नेतृत्व पदों पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के लिए आरक्षण अनिवार्य किया। महाराष्ट्र में, इसे नगर निगम अधिनियम के माध्यम से लागू किया जाता है, जो अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को भी आरक्षण प्रदान करता है। निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए, कानून के अनुसार महापौर का पद इन श्रेणियों के बीच बारी-बारी से आता रहता है।