अतिक्रमण और समय की मार से जर्जर हो चुके ऐतिहासिक बारापूला पुल के दिन अब बहुरते नजर आ रहे हैं। वर्ष 2024 में उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना द्वारा किए गए औचक निरीक्षण के बाद इस संरक्षित स्मारक के संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठाए गए। निरीक्षण के दौरान उपराज्यपाल ने पुल के आसपास बने अवैध मकानों को हटाने, पुल पर लगे सब्जी-फल और अन्य ठेलों को हटाने के साथ-साथ इसके संरक्षण के स्पष्ट निर्देश दिए थे।
इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा लगभग 35 लाख रुपये की लागत से बारापूला पुल का संरक्षण कार्य शुरू किया गया। साथ ही पुल के नीचे से बहने वाले नाले की सफाई दिल्ली जल बोर्ड द्वारा कराई गई, जिसमें बड़ी मात्रा में गाद और कचरा निकाला गया। इससे पुल की नींव और संरचना को भी मजबूती मिली है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के दिल्ली मंडल के वरिष्ठ संरक्षण सहायक रोहित ने बताया कि वरिष्ठ पुरातत्वविद् राजकुमार पटेल के मार्गदर्शन में यह संरक्षण कार्य किया जा रहा है और अब तक 90 फ़ीसद से अधिक काम पूरा हो चुका है। उन्होंने बताया कि अतिक्रमण हटाने के बाद पुल पर नष्ट हो चुके प्लास्टर की मरम्मत की गई और भारी मात्रा में मलबा हटाया गया। बीते लगभग तीन सौ वर्षों में विभिन्न विभागों द्वारा पुल पर आधे से एक मीटर तक कंक्रीट की सड़क बना दी गई थी। करीब सौ मीटर लंबे इस पुल से लगभग एक मीटर मोटी कंक्रीट हटाने के बाद मूल पत्थर सामने आए।
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संरक्षण के दौरान पुल के दोनों ओर चार-चार मीटर तक मूल पत्थर लगाए गए और बीच में चूना-कंक्रीट का उपयोग किया गया। पुल की दीवारों पर चूना-कंक्रीट का प्लास्टर किया गया तथा बीच-बीच में लगे खंभों का भी संरक्षण किया गया। इसके बाद पुल की ऐतिहासिक सुंदरता फिर से उभरकर सामने आने लगी है।
बारापूला पुल का इतिहास
करीब 500 वर्ष पूर्व मुगल बादशाह जहांगीर के आदेश पर मिहर बानू आगा द्वारा निर्मित बारापूला पुल का ऐतिहासिक महत्व रहा है। इतिहासकारों के अनुसार, मुगल शासक आगरा से दिल्ली लौटते समय यमुना नदी पार करने तथा निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह और हुमायूं के मकबरे तक पहुंचने के लिए इस पुल का उपयोग करते थे। बारह खंभों और ग्यारह मेहराबों वाला यह पुल समय के साथ एक व्यस्त सड़क में बदल गया और अतिक्रमण का शिकार हो गया, लेकिन अब संरक्षण के बाद इसकी खोई हुई पहचान फिर लौट रही है।
