बड़े नोटों को अमान्य किए जाने के सरकार के फैसले से नकदी संकट के व्यापक नकारात्मक असर की शिकायत राष्ट्रपति से करने गया विपक्ष का प्रतिनिधिमंडल अपनी एकजुटता नहीं दिखा पाया। कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी की अगुवाई में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात करने गए प्रतिनिधिमंडल में तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड) और एआइयूडीएफ समेत कई अन्य पार्टियों के नेता शामिल हुए। राकांपा, द्रमुक, वाम दल, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के नेताओं के इस प्रतिनिधिमंडल में शामिल नहीं होने से विपक्षी एकता पर सवाल खड़े हो गए। इन पार्टियों को इस बात पर आपत्ति थी कि कांग्रेस के अन्य एक प्रतिनिधिमंडल अकेले प्रधानमंत्री से अलग जाकर क्यों मिला? बहरहाल, राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने हा कि नेताओं ने राष्ट्रपति को नोटबंदी के बाद पैदा हुई स्थिति और लोगों के समक्ष आ रही समस्याओं से अवगत कराया। उन्होंने कहा, हमने राष्ट्रपति से कहा कि हम नोटबंदी, किसानों और छोटे कारोबारियों के समक्ष आ रही समस्याओं पर संसद में चर्चा करना चाहते थे।

हम संसद में चर्चा चाहते थे लेकिन सरकार ने सारे लोकतांत्रिक मूल्यों का उल्लंघन किया और इसे अवरुद्ध किया। उन्होंने कहा कि जिस तरीके से संसद का शीतकालीन सत्र चला वह अच्छी नजीर नहीं है। खरगे ने कहा, सरकार संसद की कार्यवाही चलाने में पूरी तरह विफल रही। हाथों में तख्तियां लिए मंत्रियों ने संसद को कामकाज करने की अनुमति नहीं दी।
इस प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ विभिन्न विपक्षी पार्टियों के कई अन्य नेता भी शामिल थे।

उन लोगों के द्वारा सौंपे गए ज्ञापन में कहा गया है, हम अपने लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचले जाने और हमारे विचारों को प्रस्तुत करने और संसद में हमारी आवाजें सुनी जाएं इसे दबाए जाने से बेहद दुखी हंै। हम बेहद चिंतित हैं कि हमारी संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को गंभीर खतरा है। ज्ञापन में कहा गया है, नोटबंदी के फैसले से देश में विनाशकारी स्थिति है। संविधान के रक्षक होने के नाते हम आपसे विनती करते हैं कि लोगों को आर्थिक आपदा से बचाने के लिए हस्तक्षेप करें।