छोटा सूबा है तो क्या? आलाकमान के लिए उत्तराखंड भी यूपी की तरह ही अहम है। वैसे भी 2019 के चुनाव को वे पानीपत की लड़ाई का दर्जा दे चुके हैं तो एक-एक सीट के लिए होगी रस्साकशी। उत्तराखंड में पिछली दफा भाजपा ने पांचों सीटों पर परचम लहराया था। इस बार तो सरकार भी सूबे में पार्टी की ही है सो सीटों को बचाने की चुनौती है। तभी तो सूबे के नेताओ को ताश के पत्तों की तरह फेंटना शुरू कर दिया है। हरिद्वार में शहरी निकाय चुनाव में मेयर की कुर्सी भाजपा को नहीं मिली थी। इसका खमियाजा सूबे के मंत्री और हरिद्वार के विधायक मदन कौशिक भुगतेंगे। कौशिक इस फेर में थे कि रमेश पोखरियाल निशंक की जगह उन्हें मिल जाए लोकसभा टिकट।
पार्टी के राष्ट्रीय सहसंगठन मंत्री शिव प्रकाश और सूबे के संगठन मंत्री संजय कुमार का उन्हें वरदहस्त था ही। लेकिन संजय कुमार फंस गए एक महिला के यौन उत्पीड़न के चक्रव्यूह में। जो उनकी कुर्सी पर भारी पड़ गया। पार्टी की बदनामी अलग हुई। हरिद्वार में पार्टी ने अनु कक्कड़ को मेयर का उम्मीदवार मदन कौशिक की सलाह पर बनाया था। पर वे कांग्रेस की अनिता शर्मा से हार गईं। इसे मदन कौशिक की हार के रूप में प्रचारित कर रहा है कौशिक विरोधी खेमा। इस खेमे में निशंक के साथ अशोक त्रिपाठी, पंकज सहगल, विमल कुमार और ओम प्रकाश जमदग्नि भी हैं।
पार्टी के सूबेदार अजय भट्ट और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के लिए भी अब कौशिक का बचाव मुश्किल हो रहा है। कौशिक की लोकसभा टिकट की इच्छा अधूरी रह जाएगी क्योंकि उन्हें प्रचार समिति का सदस्य बना दिया गया है। एक जमाने में कांग्रेस के नेता अमरीश कुमार के सहयोगी रहे कौशिक बजरंग दल के रास्ते भाजपा में शामिल हुए थे और 2002 में विधानसभा का टिकट पा गए थे। तब से लगातार विजय हासिल करने के कारण हरिद्वार में दबदबा स्वाभाविक था। पर मेयर के चुनाव ने करा दी किरकिरी।
