नीकु के बड़े वफादार थे विजय नारायण चौधरी। बिहार के कद्दावर दलित नेताओं में गिनती होती है चौधरी की। दो दशक तक नीतीश कुमार का साथ निभाने के बाद अचानक उनसे अलग हो गए हैं चौधरी। हालांकि उनकी हैसियत तब भी कम नहीं थी जब वे लालू यादव के साथ थे। लालू ने उन्हें मंत्री बना रखा था। लालू का साथ छोड़ कर ही नीतीश के साथ आए थे। नीतीश ने भी उन्हें विधानसभा अध्यक्ष बनाया था। उनसे पहले बिहार में कोई दलित नेता इस कुर्सी पर नहीं पहुंच पाया था। विधानसभा अध्यक्ष बना कर नीतीश ने भी वाहवाही लूटी थी और चौधरी भी गदगद हुए थे। नीतीश ने जब महादलित राजनीति शुरू की तो चौधरी ने बढ़-चढ़ कर साथ दिया था। लेकिन जब से नीतीश ने दोबारा भाजपा से तालमेल किया, चौधरी खिन्न चल रहे थे।
करीबियों से अपनी पीड़ा व्यक्त भी कर रहे थे कि नीतीश अब दलितों के हितैषी नहीं रह गए हैं। दरअसल चौधरी ने नीतीश का साथ छोड़ने का मन तो तभी बना लिया था जब जीतनराम मांझी उनसे अलग हुए थे। चर्चा तो श्याम रजक के भी नीतीश से खफा होने की सुनाई पड़ रही है। हालांकि अपनी नाराजगी को अभी तक उन्होंने सार्वजनिक नहीं किया है। उधर सियासी हलकों में कहा जा रहा है कि नीतीश जब भी दलितों को साथ नहीं रख पाए तभी उन्हें खमियाजा भी भुगतना पड़ा। अगर चौधरी व मांझी की तरह रजक भी साथ छोड़ गए तो नीतीश को महज रामविलास पासवान का ही सहारा बचेगा। लेकिन पासवान तो खुद भी वक्त की नजाकत भांपने में माहिर हैं। किसी के साथ ताउम्र रहने का कभी भरोसा देते ही नहीं। ले-देकर भाजपा के संजय पासवान बचेंगे। जो अपनी पार्टी के भीतर ही हाशिए पर चल रहे हैं। अरसे बाद एमएलसी बना कर खत्म किया है भाजपा ने उनका वनवास।
