भाजपा का रवैया भी विरोधाभासी है। उत्तर भारत में गोवंश की रक्षा की दुहाई देकर वोट बटोरती है तो उत्तर-पूर्व के राज्यों में उसकी नीति बदल जाती है। यानी येनकेन प्रकारेण सत्ता मिलनी चाहिए। पश्चिम बंगाल में पहले तो सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण के प्रयोग आजमाए। सफलता नहीं मिली तो अब यूटर्न ले लिया है। जाहिर है कि फिलहाल चिंता पंचायत चुनाव ने बढ़ा रखी है। कर्नाटक में एक भी मुसलमान को विधानसभा का टिकट भले न दिया हो पर पश्चिम बंगाल में तो पहली बार एक हजार से ज्यादा मुसलमानों को पंचायत चुनाव में उम्मीदवार बनाया है। हालांकि दिखावे को कुछ मुसलमानों को टिकट 2013 के चुनाव में भी दिए थे। उसके बाद 2016 में विधानसभा चुनाव हुए तो छह मुसलमानों को उम्मीदवार बनाया।
भले जीत एक भी न पाया था। भाजपा को बखूबी समझ आ चुका है कि पश्चिम बंगाल में उत्तर प्रदेश की तर्ज पर मुसलमानों को हाशिए पर धकेल कर कामयाबी नहीं पाई जा सकती। आखिर उनकी आबादी तीस फीसद जो ठहरी। मुसलमानों को अपने पाले में करके ही तो तृणमूल कांग्रेस 34 साल तक सूबे की सत्ता पर काबिज वाम मोर्चे को शिकस्त दे पाई। भाजपा का उत्साह माकपा और कांग्रेस के लगातार खिसक रहे जनाधार ने बढ़ाया है। वह तृणमूल कांग्रेस के मुकाबले दूसरे नंबर की पार्टी के तौर पर उभरने की लगातार जुगत भिड़ा रही है। ऐसे में मुसलमानों की नाराजगी से नुकसान होने का अहसास हो चुका है। मुसलमानों के प्रति नजरिए में बदलाव के संकेत पार्टी ने पिछले दिनों अल्पसंख्यक सम्मेलन के आयोजन से ही दे दिए थे। पार्टी के सूबेदार दिलीप घोष तो यहां तक फरमा रहे हैं कि नामांकन की प्रक्रिया के दौरान अगर हिंसा न हुई होती तो पार्टी कम से कम दो हजार मुसलमान उम्मीदवार मैदान में उतारती।
पार्टी के अल्पसंख्यक मोर्चे के अध्यक्ष अली हुसैन तो यहां तक दावा करने लगे हैं कि सूबे के मुसलमानों को अब भाजपा अपनी दुश्मन नहीं लगती। पार्टी की विकास परख नीतियों के चलते अल्पसंख्यकों का उसके प्रति भरोसा बढ़ा है। कहने को तो दिलीप घोष लोकसभा चुनाव में भी मुसलमानों की उम्मीदवारी पर सकारात्मक नजरिए से विचार का भरोसा दिला रहे हैं।
