ज्योति सिडाना
समाज में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्तियां गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही हैं। शासक, प्रशासक, समाज विज्ञानी, मनोवैज्ञानिक, शिक्षक और परिवारों तक के लिए यह जटिल और गंभीर समस्या के रूप में उभरी है। ऐसा नहीं है कि अपराध पहले नहीं होते थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तो बच्चों, किशोरों से लेकर नौजवान, प्रौढ़ और यहां कि वृद्ध भी तरह-तरह के अपराधों में लिप्त पाए जा रहे हैं। तकनीक के विकास ने भी अपराधों की प्रकृति को बदला है। यह किसी भी समाज के लिए अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता। लैंगिक और यौन अपराधों के मामले में हालात कहीं ज्यादा गंभीर हैं।
दिन-प्रतिदिन की भाषा में एक स्वीकृत दिशा से भिन्न दिशा की तरफ जाना या समाज की अपेक्षाओं का पालन न करना विचलन कहलाता है और जब यह विचलन राज्य के कानून के उल्लंघन को व्यक्त करता है तो अपराध की श्रेणी में आता है। अपराध शास्त्र में इस प्रकार के व्यवहार को विभिन्न समाज विज्ञानी भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से देखने का प्रयास करते हैं।
लोंब्रोसो तर्क देते हैं कि अपराधी कुछ जन्मजात शारीरिक विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, यानी सामान्य व्यक्तियों और अपराधी व्यक्तियों में कुछ शारीरिक विशेषताओं के आधार पर अंतर किया जा सकता है। दूसरी ओर सदरलैंड जैसे समाज विज्ञानी मानते हैं कि अपराधी जन्मजात नहीं होते, बल्कि सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण बनते हैं और मनोवैज्ञानिक जॉन बॉलबी तर्क देते हैं कि यदि बच्चों का प्रारंभिक समाजीकरण उन्हें भावनात्मक सुरक्षा नहीं दे पाता है तो उनमें आपराधिक प्रवृतियां उत्पन्न हो जाती हैं। इन सभी सैद्धांतिक विवेचनाओं के आधार पर आपराधिक घटनाओं को समझना एक पक्षीय हो जाता है।
वैश्वीकरण के प्रक्रिया के बाद से धन और शक्ति का असमान वितरण और प्रौद्योगिकी का तीव्र विकास भी अपराध को उत्पन्न करने का महत्त्वपूर्ण कारण बन कर उभरा है। यह भी एक तथ्य है कि कोरोना महामारी ने जिन परिस्थितियों को उत्पन्न किया है, उनसे भी अपराधों में अचानक वृद्धि हुई है।
कोई भी बीमारी या महामारी केवल मानव शरीर पर प्रभाव नहीं डालती, अपितु समाज की हर औपचारिक और अनौपचारिक संस्था को प्रभावित करती है। कुछ समय पूर्व ही राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) ने देश के बाईस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एक सर्वे किया था।
इसमें पाया गया कि पांच राज्यों की तीस फीसद से अधिक महिलाएं अपने पति द्वारा शारीरिक और यौन हिंसा की शिकार हुई हैं। महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के मामलों में सबसे बुरा हाल कर्नाटक, असम, मिजोरम, तेलंगाना और बिहार का है।
सर्वेक्षण बताता है कि कर्नाटक में अठारह से उनचास साल के आयु वर्ग की करीब पैंतालीस फीसद महिलाओं को घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ा। बिहार में चालीस फीसद महिलाओं को, मणिपुर में उनतालीस फीसद, तेलंगाना में सैंतीस फीसद, असम में बत्तीस फीसद और आंध्र प्रदेश में तीस फीसद महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हुईं।
ऐसा नहीं है कि अपराध केवल महिलाओं के खिलाफ ही बढ़े हों, बल्कि बच्चों और वृद्धों के खिलाफ भी अपराध व दुर्व्यवहार की घटनाएं सामने आर्इं। मुंबई में एक वृद्ध महिला के कोरोना संक्रमित निकलने पर बच्चों ने ही उसे घर से निकाल दिया। या फिर तनाव या अवसाद में आकर किसी दंपति ने आत्महत्या कर ली।
बड़े भाई ने छोटे भाई को चाकुओं से गोद दिया, क्योंकि वह उसे पूर्णबंदी में बाहर निकलने से मना कर रहा था। दिल्ली के एक सरकारी स्कूल की शिक्षिका ने सक्षहवीं मंजिल से कूद कर खुदकुशी कर ली। यह महिला पूर्णबंदी के कारण गहरे मानसिक तनाव में थी।
नोएडा में टिक-टॉक वीडियो पर कुछ दिनों से लाइक न मिलने से परेशान एक किशोर ने पंखे से लटक कर खुदकुशी कर ली। वडोदरा में आॅनलाइन लूडो खेल में पत्नी द्वारा पति को हरा देने पर उसने अपनी पत्नी को इतना पीटा कि उसकी रीढ़ की हड्डी में चोट आ गई।
केरल में दसवीं कक्षा की छात्रा ने आॅनलाइन कक्षा से न जुड़ पाने के कारण जान दे दी। ये कुछ ऐसी घटनाएं हैं जो सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या छोटी-छोटी बातें भी हत्या, आत्महत्या या झगड़े का कारण हो सकती हैं? आखिर हम इतने असहनशील क्यों होते जा रहे हैं हम?
कोरोना महामारी के दौर में घरेलू हिंसा की घटनाएं बढ़ने का एक बड़ा कारण घर से दफ्तरी काम का बढ़ता चलन भी रहा है। महिलाओं और पुरुषों का घर से बाहर निकलना बंद हो गया और घर में रह कर काम करने से परिवार के सदस्यों का उनके काम में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हस्तक्षेप बढ़ गया। परिणामस्वरुप दोनों में असहनशीलता, क्रोध और आक्रामकता बढ़ने लगी। बाहर के विश्व से संपर्क कम होने या टूटने से लोगों की परस्पर मेलजोल भी कम हो गया, जिसके कारण लोगों को अपनों से मिलने-जुलने, आपसी सुख-दुख साझा करने का मौका भी नहीं मिला।
ऐसे में तनाव और निराशा बढ़ना स्वाभाविक था। बच्चे भी घर में कैद हो गए और आॅनलाइन की गिरफ्त में आ गए। आॅनलाइन पढ़ाई, आॅनलाइन गेम, आॅनलाइन दोस्ती का नतीजा यह सामने आने लगा कि सोशल मीडिया के अधिक इस्तेमाल ने उनमें गुस्सा, तनाव, आक्रामकता हावी होती गई। इस तरह के लक्षण व्यक्तियों को आपराधिक घटनाओं की ओर आसानी से धकेलने में सफल हो जाते हैं।
ऐसा संभव है कि सार्वजानिक स्थानों, सड़कों या गलियों में अपराध की घटनाओं में कमी हुई हो, लेकिन अनौपचारिक दायरे में अपराध बढ़ा है। अनेक क्षेत्रों में नौकरियों में छंटनी हुई, बेरोजगारी और निर्धनता बढ़ी। ये सभी कारण वर्तमान दौर में आपराधिक घटनाओं में वृद्धि के लिए जिम्मेदार हैं। उत्पीड़न भी हिंसा का ही एक रूप है। महिलाओं और बच्चों का किसी भी रूप में किया जाने वाला शोषण हिंसा की संभावनाओं को ही जन्म देता है।
हाल में उत्तर प्रदेश में सिंचाई विभाग के एक जूनियर इंजीनियर को यौन शोषण मामले में गिरफ्तार किया गया। आरोपी दस साल से मासूम बच्चों को अपना शिकार बना रहा था। इतना ही नहीं वह बच्चों की अश्लील तस्वीरें और वीडियो इंटरनेट पर बेचता था। सवाल यहां यह उठता है कि अब जब कि हम एक निगरानीमूलक समाज में रह रहे हैं।
यानी हर जगह सीसी टीवी कैमरे लगे हैं (अधिकांश जगहों पर लिखा मिलता है आप कैमरे की नजर में हैं), तो फिर कैसे एक व्यक्ति यह सब करता रहा लेकिन कभी पकड़ा नहीं गया। क्यों? इसके प्रति क्या राज्य की कोई जवाबदेही नहीं है? आखिर निगरानी की तकनीक कहां गई? क्या अश्लील वेबसाइटों पर सरकारों की कोई पकड़ नहीं है या फिर इस लाभ के बाजार में कुछ प्रभावशाली लोग भी शामिल थे? प्रौद्योगिकी के तीव्र विकास ने साइबर क्राइम को तीव्र किया है।
आज बाजार राज्य, समाज और परिवार से बड़ा हो गया है, या कहें कि बाजार ने सभी औपचारिक-अनौपचारिक संस्थाओं को निगल लिया है। इसलिए राज्य और समाज के संबंधों पर और उनकी भूमिका पर गहन चिंतन की आवश्यकता है। यह सच है कि अनेक बार आक्रामकता, निराशा, क्रोध और समाज या समूह के प्रति घृणा या धोखा भावनात्मक रूप से व्यक्ति को अपराध के रास्ते पर ले जाता है। केवल शिक्षा, जागरूकता, व्यापक तार्किक समझ एवं संबंधित घटना की स्वयं द्वारा विस्तृत विवेचना व्यक्ति को अपराध करने या उसमें फंसने से रोक सकती है।
जहां तक महिलाओं के विरुद्ध अपराध का प्रश्न है, तो यह निर्धनता, बेरोजगारी, पुरुष सत्तात्मकता, महिलाओं की व्यावसायिक एवं पेशेवर दक्षताओं के प्रति संदेह आदि ऐसे पक्ष हैं जिनके आधार पर महिलाओं के विरुद्ध अपराध की कार्य-कारणता को समझा जा सकता है।
वर्तमान समाज ‘बाजार समाज’ है जहां व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं से नहीं ‘लालसाओं’ से निर्देशित और नियंत्रित होता है। ऐसे समाज में अपराध की दर में वृद्धि होने की संभावनाओं से कैसे इंकार किया जा सकता है!

