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महाभारत के युद्ध से ठीक पहले अर्जुन का मन विषाद और द्वंद्व से भर गया था। वे अपने ही कुल-परिवार, गुरुजनों और रिश्तेदारों के खिलाफ युद्ध करने से विचलित थे। इसी दुविधा में उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा कि वे युद्ध के बजाय संन्यास धारण करना चाहते हैं। परन्तु श्रीकृष्ण ने उन्हें संन्यास नहीं, बल्कि कर्तव्य पालन का मार्ग दिखाया। इसी विषय पर प्रेमानंद महाराज ने एक भक्त के प्रश्न का उत्तर देते हुए जीवन का सार समझाया—’संन्यास से अधिक महत्वपूर्ण है अपना कर्तव्य निभाना।’ (Photo Source: Freepik)
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कर्तव्य ही जीवन का मूल धर्म – ‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः’
प्रेमानंद महाराज बताते हैं कि मनुष्य को जीवन अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए मिलता है। श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं— “स्वधर्मे निधनं श्रेयः, परधर्मो भयावहः।” अर्थात् अपना धर्म निभाते हुए मृत्यु भी श्रेष्ठ है, जबकि दूसरे के धर्म का अनुकरण भयावह होता है। (Photo Source: PremanandJi Maharaj/Facebook) -
अर्जुन क्षत्रिय थे, और उनका धर्म न्याय की रक्षा के लिए युद्ध करना था। लेकिन युद्ध के ठीक पहले उनके मन में मोह उत्पन्न हुआ और वे संन्यास लेना चाहते थे। कृष्ण ने समझाया कि जब तक अपने निज धर्म का कार्य पूरा नहीं होता, तब तक संन्यास उचित नहीं। जब तक कर्तव्य बाकी है, तब तक कर्म करना ही श्रेष्ठ है। (Photo Source: Freepik)
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स्मरण में रहकर कर्म करो
श्रीकृष्ण का संदेश केवल युद्ध तक सीमित नहीं था। वे अर्जुन से कहते हैं— “सर्वदा सर्वकाले निर्युद्ध्य च।” अर्थात् हर समय मेरा स्मरण करते हुए युद्ध करो। प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि यह उपदेश आज के हर व्यक्ति के लिए भी समान रूप से लागू होता है।पने कर्म-पथ पर दृढ़ रहकर, साहस और श्रद्धा से आगे बढ़ें। (Photo Source: Unsplash) -
उन्होंने आगे कहा, “आप चाहे— डॉक्टर हों, शिक्षक हों, वकील हों, किसान हों, व्यापारी हों… आपका काम ही आपका धर्म है। ईमानदारी, निष्ठा और भगवान के स्मरण के साथ अपना कार्य करना ही वास्तविक पूजा है, और यही परम कर्तव्य भी।” (Photo Source: PremanandJi Maharaj/Facebook)
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संघर्ष से भागना नहीं, संघर्ष से सीखना चाहिए
महाराज जी बताते हैं कि जीवन का अर्थ ही संघर्ष और मेहनत है। यदि मनुष्य संघर्ष छोड़ दे, तो उसकी प्रगति रुक जाती है। इसी संघर्ष को महाभारत में ‘युद्ध’ कहा गया है। जैसे अर्जुन अपने वास्तविक धर्म से हटकर संन्यास लेना चाहते थे, वैसे ही जीवन में कठिनाइयों से घबराकर हम भी अक्सर कर्तव्य से दूर भागना चाहते हैं। परन्तु भगवान चाहते हैं कि हम अपने कर्म-पथ पर दृढ़ रहकर, साहस और श्रद्धा से आगे बढ़ें। (Photo Source: Unsplash) -
संत रविदास जी का उदाहरण
प्रेमानंद महाराज एक अद्भुत कथा सुनाते हैं, जो कर्म-प्रधान जीवन का श्रेष्ठ उदाहरण है। संत रविदास जी गृहस्थ थे, सामान्य जीवन जीते थे, परंतु अपने कर्म को ही पूजा मानते थे। एक बार उन्होंने एक पंडित से गंगा जी को दो केले अर्पित करने को कहा। जब पंडित ने गंगा में वे केले अर्पित किए, तो गंगा जी का हाथ प्रकट हुआ और उन्होंने पंडित को स्वर्ण कंगन देकर रविदास जी के लिए भेजा। (Photo Source: PremanandJi Maharaj/Facebook) -
यह चमत्कार दर्शाता है कि— जहा मन शुद्ध है, वहीं ईश्वर विराजते हैं। जहां कर्म शुद्ध है, वहीं पूजा पूर्ण है। संत रविदास का संदेश—“मन चंगा तो कठौती में गंगा”— बताता है कि धर्म स्थानों में नहीं, बल्कि मन की निर्मलता और कर्म की पवित्रता में बसता है। (Photo Source: PremanandJi Maharaj/Facebook)
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जीवन में कर्म ही पूजा है
अंत में प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि जैसे अर्जुन का धर्म युद्ध था, वैसे ही हमारा धर्म हमारा कार्य है। ईमानदारी, सत्यता और भगवान के स्मरण के साथ किए गए कर्म ही सच्ची पूजा हैं। भगवान तब प्रसन्न होते हैं जब मनुष्य अपने कर्तव्य से भागता नहीं, बल्कि उसे पूर्ण निष्ठा के साथ निभाता है। इसी कारण श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा— “संन्यास नहीं, अर्जुन… इस समय युद्ध करो। युद्ध करते हुए मेरा स्मरण करो। यही तुम्हारा स्वधर्म है, यही तुम्हारा परम कर्तव्य है।” (Photo Source: PremanandJi Maharaj/Facebook)
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