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लगभग सभी इंसानों ने भावनाओं को छुपाने की कला में महारत हासिल कर ली है। हम मुस्कान को नकली बना सकते हैं, आवाज के उतार-चढ़ाव को कंट्रोल कर सकते हैं, यहां तक कि चेहरे पर ‘पोकर फेस’ रखकर सामने वाले को भ्रमित भी कर सकते हैं। लेकिन एक भावना ऐसी है, जो हमारी सारी कोशिशों के बावजूद काबू में नहीं आती- ब्लश करना यानी शर्माना (शर्म से लाल होना)। (Photo Source: Pexels)
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ब्लशिंग क्यों है सबसे अलग भावना?
ब्लशिंग कोई सामान्य इमोशनल रिएक्शन या सीखी हुई आदत नहीं, बल्कि एक फिजियोलॉजिकल प्रतिक्रिया है। जब हम शर्मिंदा होते हैं, असहज महसूस करते हैं, अचानक ध्यान का केंद्र बन जाते हैं या खुद को जज होते हुए महसूस करते हैं, तो दिमाग सीधे ब्लड वेसल्स को सिग्नल भेजता है। (Photo Source: Unsplash) -
नतीजा?
गालों पर अचानक खून का तेज प्रवाह और लालिमा। इसका सीधा संबंध स्वायत्त तंत्रिका प्रणाली (Autonomic Nervous System) से होता है, जो शरीर के उन कार्यों को नियंत्रित करता है, जिन पर इंसान का कोई सचेत नियंत्रण नहीं होता- जैसे दिल की धड़कन या पसीना आना। यही वजह है कि ब्लशिंग को न तो रोका जा सकता है और न ही जानबूझकर किया जा सकता है। (Photo Source: Pixabay) -
क्यों नहीं रोका जा सकता ब्लश करना?
ब्लशिंग इसलिए अनकंट्रोल्ड है क्योंकि यह फाइट-ऑर-फ्लाइट सिस्टम से जुड़ी होती है। इसमें कोई सोच-समझकर लिया गया फैसला शामिल नहीं होता। दिमाग के सोचने से पहले यह सेकंड्स में हो जाती है। यही वजह है कि आप चाहे जितना खुद को ‘कूल’ दिखाने की कोशिश करें, शर्म, लज्जा या झिझक आते ही गाल लाल हो ही जाते हैं। (Photo Source: Unsplash) -
शर्म, झिझक… या गर्व?
अक्सर माना जाता है कि ब्लश करना सिर्फ शर्मिंदगी की निशानी है, लेकिन साइंस कुछ और कहती है। साइंस के मुताबिक, शर्म या गलती पर, सार्वजनिक ध्यान मिलने पर, किसी की तारीफ सुनकर, किसी निजी भावना के उजागर होने पर ब्लशिंग ट्रिगर हो सकती है। यानी ब्लश करना कमजोरी नहीं, बल्कि इमोशनल सेंसिटिविटी का संकेत है। (Photo Source: Pexels) -
किन भावनाओं से जुड़ी होती है ब्लशिंग?
ब्लशिंग आमतौर पर उन भावनाओं से जुड़ी होती है, जिन्हें Self-conscious emotions कहा जाता है, जैसे- शर्मिंदगी (Embarrassment), संकोच या लज्जा (Shame), अपराधबोध (Guilt), कभी-कभी गर्व या तारीफ सुनने पर भी। जब हमें लगता है कि लोग हमें देख रहे हैं या हमें जज कर रहे हैं, तब यह प्रतिक्रिया अपने आप सामने आ जाती है। (Photo Source: Unsplash) -
सोशल साइकोलॉजी क्या कहती है?
सोशल साइकोलॉजी के अनुसार, ब्लश करना एक ‘ईमानदार संकेत’ (Honest Signal) है। जब कोई व्यक्ति ब्लश करता है, तो सामने वाला उसे ज्यादा सच्चा, भरोसेमंद, और सामाजिक नियमों के प्रति सजग मानता है। यही कारण है कि कई रिसर्च में पाया गया है कि ब्लश करने वाले लोगों को सामाजिक तौर पर ज्यादा स्वीकार किया जाता है। यही कारण है कि कई बार ब्लशिंग लोगों के बीच भरोसा और अपनापन भी बढ़ाती है। (Photo Source: Unsplash) -
कमजोरी नहीं, इंसानी सच्चाई
हालांकि समाज में ब्लश करना अक्सर ‘अजीब’ या ‘Awkward’ माना जाता है, लेकिन असल में यह इंसान होने का सबसे सच्चा प्रमाण है। यह दिखाता है कि हमें दूसरों की राय की परवाह है, हम भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं, हमारे अंदर संवेदनशीलता और ईमानदारी है। एक ऐसी दुनिया में, जहां भावनाएं छुपाई जाती हैं और नकाब आम हो गए हैं, ब्लशिंग हमारी सच्चाई का आईना है। (Photo Source: Unsplash)
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