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महाभारत का युद्ध केवल एक राजसिंहासन के लिए लड़ा गया संघर्ष नहीं था, बल्कि यह धर्म, कर्म, विकल्प और मानवीय कमजोरियों की सबसे गहरी परीक्षा था। भगवान श्रीकृष्ण सर्वज्ञ थे- उन्हें युद्ध का परिणाम पहले से ज्ञात था। फिर भी प्रश्न उठता है कि यदि वे चाहते, तो एक क्षण में युद्ध समाप्त क्यों नहीं कर दिया? उत्तर केवल शक्ति में नहीं, बल्कि धर्म की प्रकृति में छिपा है। (Photo Source: Unsplash)
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धर्म को स्थापित होना था, थोपना नहीं
यदि श्रीकृष्ण स्वयं कौरवों का संहार कर देते, तो धर्म भय से स्वीकार किया जाता, समझ से नहीं। धर्म का मूल्य तभी है जब मनुष्य उसे अपने विवेक से चुने, न कि ईश्वर के भय से माने। महाभारत के माध्यम से संसार को यह देखना था कि अधर्म के क्या परिणाम होते हैं, केवल यह नहीं कि अधर्मियों को दंड मिला। (Photo Source: Unsplash) -
संसार को नैतिक धुंधलापन (Moral Grey Areas) दिखाना आवश्यक था
महाभारत श्वेत-श्याम कथा नहीं है। इसमें कोई पूर्णतः निर्दोष नहीं। जैसे- युधिष्ठिर का अर्धसत्य, अर्जुन का मोह और युद्ध से विमुख होना, भीम का नियम तोड़कर किया गया प्रहार, और अश्वत्थामा का अमानवीय अपराध। श्रीकृष्ण ने युद्ध को बहने दिया ताकि यह स्पष्ट हो सके कि धर्मयुद्ध भी त्रासदी से मुक्त नहीं होता। (Photo Source: Freepik) -
अधर्म के हर स्तंभ का अलग-अलग पतन जरूरी था
यदि सभी अधर्मी एक ही क्षण में नष्ट हो जाते, तो संदेश धुंधला हो जाता। हर प्रमुख पात्र का अंत उसकी प्रकृति और कर्म के अनुसार हुआ। जैसे- भीष्म गिरे अपने मौन अपराध के कारण, द्रोण गिरे सत्य और कर्तव्य के संघर्ष में, कर्ण गिरे अहंकार और गलत निष्ठा के बोझ तले, और दुर्योधन गिरे लोभ और ईर्ष्या के परिणामस्वरूप। हर पतन एक अलग संदेश था। (Photo Source: Freepik) -
कर्म को स्वयं को भस्म करने का अवसर देना था
हर योद्धा पिछले जन्मों और इस जीवन के कर्मों का बोझ लेकर आया था। महाभारत का युद्ध एक कर्माग्नि यानी अग्निकुंड था, जहां- मौन अन्याय, स्वार्थ, अहंकार, अधर्म का समर्थन एक-एक कर जलता गया। हर दिन एक परत जलती रही। यदि युद्ध जल्दी समाप्त हो जाता, तो अधूरे कर्म और अधूरी सीखें शेष रह जातीं। (Photo Source: Unsplash) -
18 का अंक केवल संयोग नहीं, प्रतीक है
महाभारत में 18 बार-बार आता है। जैसे – 18 दिन का युद्ध, महाभारत के 18 पर्व, गीता के 18 अध्याय, और 18 अक्षौहिणी सेनाएं। यह पूर्णता और ब्रह्मांडीय संतुलन का संकेत है, जब तक चक्र पूरा न हो, समाधान संभव नहीं। (Photo Source: Freepik) -
योद्धाओं को चयन का अवसर मिलना था
श्रीकृष्ण कभी भी मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा नहीं छीनते। जैसे कि युयुत्सु ने भाइयों के विरुद्ध धर्म चुना और कौरवों को छोड़ पांडवों का साथ चुना, कर्ण ने सब जानकर भी कृष्ण का प्रस्ताव ठुकराया और दुर्योधन का साथ चुना, कई कौरव सहयोगी चेतावनियों के बाद भी अधर्म के साथ रहे। 18 दिन का समय विकल्प के लिए था, बाध्यता के लिए नहीं। (Photo Source: Freepik) -
श्रीकृष्ण का उद्देश्य मार्गदर्शन था, स्थानापन्न बनना नहीं
श्रीकृष्ण ने कभी स्वयं को राजा या दंडाधिकारी नहीं बनाया। वो शांति दूत बने, अर्जुन के सारथी बने, रणनीतिकार बने, संहारक नहीं। ईश्वर तब हस्तक्षेप करते हैं जब मानवता लड़खड़ाती है, लेकिन मनुष्य को स्वयं उठ खड़ा होने का अवसर भी देते हैं। (Photo Source: Pexels)
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