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इस वक्त ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती काफी चर्चा में है। दरअसल, प्रयागराज में चल रहे माघ मेला में मौनी अमावस्या स्नान पर उन्हें स्नान नहीं करने दिया गया। इसके बाद से जमकर बवाल मचा हुआ है। प्रयागराज माघ मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को एक औपचारिक नोटिस जारी कर उनके शंकराचार्य पद के दावे पर स्पष्टीकरण मांगा है। ऐसे में आइए जानते हैं कैसे मिलती है शंकराचार्य की उपाधि और हिंदी धर्म में इनकी क्या अहमियत होती है। (Photo: ANI)
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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आदि शंकराचार्य ने मठों की शुरुआत की थी। वह हिंदू दार्शनिक और धर्मगुरु थे, इन्हें जगद्गुरु के नाम से भी जाना जाता है। (Photo: Indian Express)
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उनका उद्देश्य सनातन धर्म की रक्षा और प्रसार करना था, जिसके लिए उन्होंने अपने प्रमुख चार शिष्यों को देश में चार दिशाओं में स्थापित किए गए मठों की जिम्मेदारी दी। इन मठों के प्रमुख को शंकराचार्य कहा जाता है। शंकराचार्य को सनातन धर्म में सर्वोच्च माना जाता है। (Photo: Indian Express)
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जो भी शंकराचार्य बनता है उसे त्यागी, दंडी संन्यासी, संस्कृत, चतुर्वेद, वेदांत ब्राह्मण, ब्रह्मचारी और पुराणों का ज्ञान होना बेहद आवश्यक है। (Photo: Indian Express) सिर्फ शिव जी ही नहीं इन देवताओं की भी नागा साधु करते हैं पूजा, ऐसा होता है भोजन
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इसके साथ ही शंकराचार्य को अपने गृहस्थ जीवन को त्यागना, मुंडन, पिंडदान और रुद्राक्ष धारण करना काफी अहम होता है। (Photo: Indian Express)
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शंकराचार्य बनने के लिए ब्राह्मण होना अनिवार्य है। साथ ही चारों वेद और छह वेदांगों का ज्ञाता होना जरूरी है। (Photo: Indian Express)
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शंकराचार्य बनने के लिए अखाड़ों के प्रमुखों, आचार्य महामंडलेश्वरों, प्रतिष्ठित संतों की सभा की सहमति जरूरी है। साथ ही काशी विद्वत परिषद की स्वीकृति की मुहर भी अनिवार्य है। इसके बाद ही शंकराचार्य की उपाधि मिलती है। (Photo: Indian Express)
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आदि शंकराचार्य ने देश में जो चार मठों की स्थापना किया था उसमें से एक उत्तर भारत के उत्तराखंड के चमोली जिले में ज्योतिर्मठ है। इसके वर्तमान में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती हैं। (Photo: ANI)
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अन्य मठों के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को शंकराचार्य नहीं मानते हैं। इनके शंकराचार्य बनने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहा है। दरअसल स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने गुरु के निधन के बाद खुद को ही शंकराचार्य घोषित कर लिया था। (Photo: ANI) कोडवर्ड में क्यों बात करते हैं नागा साधु? जानें दाल, नमक से आटा तक को क्या कहते हैं