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गर्भावस्था का समय केवल 40 हफ्ते यानी 9 महीने की होती है। यह सवाल काफी लोगों के मन में आता होगा कि यह समय और भी लंबी क्यों नहीं हो सकती या फिर छोटी। आइए जानते हैं धार्मिक मान्यताएं क्या हैं: (Photo: Freepik)
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हमारे वेदों में जीवन से जुड़े हर एक पहलू और रहस्य को बड़े ही सरल शब्दों में बताया गया है। जिन चीजों की आज खोज हो रही है उनके बारे में हमारे वेदों में कई लाख वर्ष पहले ही लिख दी गई थी। आज से 2800 वर्ष पूर्व लिखी गई सुश्रुत संहिता में कई गंभीर रोगों के इलाज के बारे में जिक्र है। (Photo: Freepik)
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गर्भ प्रवेश द्वार है
जब जीव विज्ञान ने भ्रूण विकास की व्याख्या नहीं की थी तब धर्मग्रंथों ने इसे समझाया था। धर्मग्रंथों के अनुसार नौ महीने का समय केवल शरीर बनने का नहीं बल्कि आत्मा को भूलने, उतरने और नई शुरुआत के लिए तैयार होने का समय है। कई भारतीय ग्रंथों में जीवन का आरंभ जन्म से नहीं मनाया गया है। जन्म को केवल प्रवेश-द्वार माना जाता है, शुरुआत नहीं। (Photo: Freepik) -
पुराने जन्म के कर्मों के साथ गर्भ में आत्मा प्रवेश करती है
गर्भ सिर्फ शरीर नहीं, एक रास्ता है। ग्रंथों के अनुसार आत्मा गर्भ में अपने पुराने जन्मों के कर्म के साथ प्रवेश करती है। ये बोझ यादें बल्कि प्रवृत्तियां मानी जाती हैं। गर्भ में रहते-रहते वह अपनी पुरानी बातें और यादें भूलने लगती है। गर्म को ऐसा स्थान माना गया है जहां आत्मा अपनी ब्रह्मा चेतना को धीरे-धीरे भूलने लगती है। नौ महीने केवल प्रतीक्षा नहीं बल्कि यह असीमता से सीमितता तक की एक धीमी यात्रा है। हर महीने आत्मा स्मृतियों से हल्की होती जाती है, ताकि वह शरीर, समय, भूख और भावनाओं में जी सके। (Photo: Freepik) मंदिर या फिर वृक्षों के चारों ओर परिक्रमा क्यों करते हैं? क्या कहते हैं इसे -
नौ महीने का मतलब
धार्मिक ग्रंथों में नौ को पूर्णता का प्रतीक माना गया है। नई शुरुआत से पहले की अंतिम कड़ी। भारतीय दर्शन में नौ ग्रह, नौ देवियां, नौ रस जिन्हें जीवन के पूर्ण चक्र का संकेत माने जाते हैं। इसी तरह नौ महीने का समय आत्मा और शरीर दोनों की पूरी तैयारी का समय माना गया है। (Photo: Freepik) -
नौ महीने से कम या ज्यादा का अर्थ
इससे कम समय को अधूरी तैयारी और अधिक समय को ब्रह्मांडीय लय में बाधा समझा जाता है। इसलिए जन्म तब नहीं होता जब केवल शरीर तैयार होता है। जब कर्म, काल और सृष्टि का संतुलन पूरी तरह बन जाता है तब जन्म होता है। (Photo: Freepik) -
छोटी होने लगती है चेतना
कई शास्त्रों में आत्मा को बेहद ही विशाल माना गया है। शरीर में आने के लिए उसे छोटा, सीमित, पूर्व को भूलना और भावनाएं सीखना होता है। यह सब कुछ धीरे-धीरे सीखना पड़ता है जिसके लिए नौ महीने का समय लगता है। (Photo: Freepik) -
सात महीने बाद आत्म पछताती है
कहा जाता है कि सातवें महीने तक आत्मा को बीते जन्म याद आने लगते हैं। वह अपने कर्मों पर पछताती है और मुक्ति की कामना करती है। यही विचार गर्म संस्कार की परंपरा का आधार बना कि गर्भावस्था में शांत वाणी, प्रार्थना, संगीत और सकारात्मक भाव बच्चे पर प्रभाव डालते हैं। (Photo: Freepik) -
जन्म का समय कर्म से जुड़ा है
धर्मग्रंथों के अनुसार जन्म का समय पहले से ही तय होता है। यह संयोग नहीं होता बल्कि कर्म, परिवार, ग्रह और किस्मत से जुड़ा होता है। यही वजह है कि पूरे नौ महीने को सही और संतुलित समय माना गया है। (Photo: Freepik) -
भूलना जरूरी क्यों है
धार्मिक मान्यता के अनुसार अगर मनुष्य को पिछले जन्म की सारी चीजें याद रहती हैं तो उसे दुख, पछतावा और दर्द जीने नहीं देंगे। इसलिए नौ महीने में आत्मा अपनी पुरानी यादें भूल जाती है और सिर्फ नई जिंदगी की तैयारी लेकर आती है। (Photo: Freepik) शाम के वक्त घर में क्यों जलाया जाता है कपूर का तेल और लौंग