-
सिनेमा में अक्सर महिलाओं को एक तय ढांचे में दिखाया गया है, या तो आदर्श, या पीड़िता, या फिर सपोर्टिंग किरदार। लेकिन कुछ फिल्में ऐसी भी हैं जो महिलाओं को पूरी जटिलता, विरोधाभास, ग़ुस्से, थकान और ताकत के साथ पेश करती हैं- बिल्कुल इंसानों की तरह। ये फिल्में यह साबित करती हैं कि महिलाओं की कहानियां सिर्फ ‘प्रेरणादायक’ नहीं, बल्कि गहरी, राजनीतिक और निजी हो सकती हैं। (Still From Film)
-
Persepolis (2007)
यह फिल्म ईरान की इस्लामिक रिवॉल्यूशन के दौर में बड़ी हो रही एक लड़की मार्जाने की कहानी है। खास बात यह है कि इसे मार्जाने सात्रापी ने खुद अपनी ग्राफिक नॉवेल पर निर्देशित किया। यह सिर्फ एक राजनीतिक कहानी नहीं, बल्कि पहचान, विद्रोह और उस घुटन की कहानी है जब एक देश आपके पहनावे, सोच और जिंदगी पर नियंत्रण करना चाहता है। एनिमेटेड होने के बावजूद यह फिल्म बेहद ईमानदार और भावनात्मक है। (Still From Film) -
The Color Purple (2023)
1900 के शुरुआती दौर में अमेरिका के ग्रामीण दक्षिण में रहने वाली अश्वेत महिलाओं की कहानी। सेली का सफर शोषण से आत्मसम्मान तक का है- धीमा, दर्दनाक, लेकिन सच्चा। यह फ़िल्म बताती है कि आजादी कोई एक पल नहीं, बल्कि एक लंबी प्रक्रिया होती है। बहनापा, सहारा और आत्म-खोज इस कहानी की जान हैं। इसे महिलाओं ने बनाया और महिलाओं के लिए बनाया। (Still From Film) -
Portrait of a Lady on Fire (2019)
18वीं सदी के फ्रांस में दो महिलाओं के बीच पनपता प्यार। खास बात यह है कि इस फिल्म में लगभग कोई पुरुष किरदार नहीं है। निर्देशक सेलीन सियामा ने जानबूझकर ‘मेल गेज़’ को बाहर रखा। यहां महिलाएं एक-दूसरे को बराबरी से देखती हैं, समझती हैं, चाहती हैं। यह फिल्म शोर नहीं मचाती, लेकिन भीतर तक असर करती है। (Still From Film)
(यह भी पढ़ें: बार-बार देखें फिर भी उतनी ही मजेदार लगती हैं ये ऑल टाइम आइकॉनिक कॉमेडी फिल्में, देखें लिस्ट) -
Barbie (2023)
एक खिलौने पर बनी फिल्म जिसने पितृसत्ता, पहचान और सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए। ग्रेटा गर्विग ने ‘बार्बी’ को गुलाबी दुनिया से निकालकर असली दुनिया की सच्चाइयों से टकराया। यह फिल्म साबित करती है कि जब महिलाओं को कहानी कहने की आजादी मिलती है, तो फेमिनिस्ट सिनेमा भी मेनस्ट्रीम हो सकता है और अरबों कमा सकता है। (Still From Film) -
Everything Everywhere All at Once (2022)
एवलिन एक थकी हुई, मध्यम उम्र की, चीनी अप्रवासी महिला, जो लॉन्ड्री चलाती है और अचानक मल्टीवर्स बचाने की जिम्मेदारी उस पर आ जाती है। वह न तो परफेक्ट है, न ही ग्लैमरस। लेकिन वही उसकी ताकत है। मिशेल योह का यह किरदार दिखाता है कि हीरो बनने के लिए ‘खास’ होना जरूरी नहीं, बस इंसान होना काफी है। इस रोल के लिए मिशेल योह ने 60 साल की उम्र में ऑस्कर जीता। (Still From Film) -
Whale Rider (2002)
न्यूज़ीलैंड की माओरी जनजाति की एक लड़की पैई, जहां परंपरा कहती है कि सिर्फ लड़के ही मुखिया बन सकते हैं। परंपरा कहती है- नेतृत्व सिर्फ लड़कों का अधिकार है। पैई न तो अनुमति मांगती है, न इंतजार करती है- वह बस अपने काम से साबित करती है कि वह योग्य है। निर्देशक निकी कारो ने इस फिल्म में आदिवासी महिलाओं की आवाज को केंद्र में रखा। सरल कहानी, लेकिन बेहद गहरा संदेश। (Still From Film) -
Bend It Like Beckham (2002)
ब्रिटिश-इंडियन लड़की जेस फुटबॉल में करियर बनाना चाहती है, लेकिन उसका पारंपरिक सिख परिवार इसके खिलाफ है। गुरिंदर चड्ढा द्वारा निर्देशित यह फिल्म संस्कृति, पारिवारिक दबाव और अपनी पहचान चुनने की जद्दोजहद को बेहद सहजता से दिखाती है। यह आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। (Still From Film)
(यह भी पढ़ें: ओवरडोज ड्रामा से ब्रेक चाहिए? ये तमिल रोम-कॉम फिल्में आपको सुकून देंगी)