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राजधानी दिल्ली समेत पूरे देश में महाशिवरात्रि का पर्व पूरे उत्साह और उमंग के साथ मनाया गया। दिल्ली में चांदनी चौक स्थित मशहूर गौरीशंकर मंदिर समेत कई मंदिरों में इस पर्व पर भक्तों की जबरदस्त भीड़ दिखी और सभी मंदिर 'हर हर महादेव' के उद्घोषों से गूंज रहे थे। सभी भक्त भोले बाबा की भक्ति से सराबोर नजर आए। मंदिरों में सुबह से ही भोले शंकर का जलाभिषेक करने के लिए भक्त कतारों में नजर आए। देश के अन्य राज्यों में भी महाशिवरात्रि का पर्व धूमधाम से मनाया गया। जानिए कुछ प्रमुख मंदिरों के बारे में जहां पूजा करने से भगवान शिव की विशेष कृपा आपके ऊपर बनी रहेगी।
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महाशिवरात्रि के मौके पर दिल्ली के चांदनी चौक के गौरी शंकर मंदिर में सुबह से ही भक्तों का तांता लगा रहा। दिल्ली के चांदनी चौक में दिगंबर जैन लाल मंदिर के नजदीक 800 साल पुराना गौरी शंकर मंदिर स्थित है। यह मंदिर भारत के शैव सम्प्रदाय के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। इसे कॉस्मिक पिलर या पूरे ब्रह्मांड का केंद्र माना जाता है। इस मंदिर को एक मराठा सैनिक आपा गंगाधर के द्वारा बनाया गया था जो भगवान शिव का परम भक्त था।
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अहमदाबाद में भगवान के द्वादश ज्योर्तिलिंगों में से प्रथम गुजरात के गिर सोमनाथ जिले में हिंद महासागर के तट पर स्थित पौराणिक सोमनाथ महादेव मंदिर को महाशिवरात्रि के मौके भक्तों की भारी भीड़ उमडी। वहां देश के कोने कोने से पहुंचे श्रद्धालुओँ ने पूजा अर्चना और जलाभिषेक किया। अन्य मंदिरों में भी आज विशेष पूजा और शिव-पार्वती के दर्शन के लिए शिवभक्त पहुंचे।

वाराणसी में स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह हजारों वर्षों से हिंदू धर्मावलंबियों में विशिष्ट स्थान रखता है। ऐसा माना जाता है कि एक बार इस मंदिर के दर्शन करने और पवित्र गंगा में स्नान कर लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आदि शंकराचार्य, सन्त एकनाथ रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, गोस्वामी तुलसीदास सभी का आगमन हुआ हैं। यहीं पर सन्त एकनाथजी ने वारकरी सम्प्रदाय का महान ग्रन्थ श्रीएकनाथी भागवत लिखकर पूरा किया। -
मध्यप्रदेश के उज्जैन में स्थित 'दक्षिणमुखी' इस ज्योतिर्लिंग को स्वयंभू माना जाता है। राज्य के उज्जैन स्थित महाकालेश्वर और खंडवा स्थित ओंकारेश्वर मंदिर में रात से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलीं। देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल इन दोनों मंदिर परिसरों में प्रबंधन द्वारा देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालुओं के लिए विशेष व्यवस्थाएं की गईं। सैकड़ों लोग शिव-पार्वती के विशेष पूजन के लिए पहुंचे।

लखीमपुर खीरी के गोला गोकर्णनाथ छोटी काशी के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। मान्यता है कि त्रेता युग में राम-रावण युद्ध के समय रावण ने अपनी तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न किया ताकि वह युद्ध जीत सके। शिवजी ने शिवलिंग का आकार लेकर रावण को लंका में शिवलिंग स्थापित करने का निर्देश दिया। इसके लिए भगवान शिव ने एक शर्त रखी कि शिवलिंग को बीच में कहीं पर भी नीचे नहीं रखना है। लेकिन रास्ते में रावण ने एक गड़रिये को शिवलिंग पकड़ने को कहा। कहते हैं कि भगवान शिव ने अपना वजन बढ़ा दिया और गड़रिये को शिवलिंग नीचे रखना पड़ा। रावण को भगवान शिव की चालाकी समझ में आ गयी और वह बहुत क्रोधित हुआ। रावण समझ गया कि शिवजी लंका नहीं जाना चाहते ताकि राम युद्ध जीत सकें। क्रोधित रावण ने अपने अंगूठे से शिवलिंग को दबा दिया जिससे उसमें गाय के कान (गौ-कर्ण) जैसा निशान बन गया। इस मंदिर का उल्लेख वाराह पुराण में भी है।