Importance of Education: विकसित भारत की लक्ष्य-साधना निश्चित रूप से देश के हर नागरिक को प्रोत्साहित करेगी। आज के वैश्विक अस्थिरता के माहौल में ऐसा कौन होगा, जो भारत को विकसित होते न देखना चाहे! भारत के संविधान निर्माताओं ने उस समय चौदह साल तक के हर बच्चे को अगले दस वर्षों में अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का लक्ष्य निर्धारित किया था। वे सभी देश की सामर्थ्य की वास्तविकता से अवगत थे, मगर यह भी जानते थे कि बड़े लक्ष्य जो प्रेरणा देते हैं, वे बहुत दूर तक ले जाते हैं।

समय ने इसे सिद्ध किया है, हालांकि लक्ष्य अभी भी कहीं न कहीं अपनी दूरी दर्शाता है। लक्ष्य-साधना की सफलता के लिए यह मानकर ही चलना होगा कि इसके लिए सार्वभौमिक स्तर पर देश के प्रत्येक नागरिक का योगदान आवश्यक होगा। जो कमी दिखेगी, उस पर भी सामाजिक सद्भाव और पंथिक समरसता को और अधिक सशक्त बनाकर सफलता के द्वार खोले जा सकते हैं। अत: इन दोनों पक्षों को सरकारी प्रयासों में भी प्रमुखता देनी होगी, लेकिन उसके लिए समाज तथा शिक्षा संस्थानों का योगदान सर्वोपरि होगा।

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भारत में अधिकांश अध्यापक बहु-जातीय और बहु-पंथिक कक्षाओं में पढ़ाते हैं तथा वे स्वयं भी ऐसी ही कक्षाओं में पढ़कर आए होते हैं। विविधता को साझा करने का ऐसा संजोग शायद ही कहीं और इतनी प्रचुरता से मिलता होगा! भारत की प्राचीन ज्ञानार्जन परंपरा की गहराई, सूक्ष्मता और वैश्विकता में निहित ‘सर्वभूत हिते रत:’ की भावना का सम्मान भी सर्वत्र होता है। जहां पूर्वाग्रह बौद्धिकता को ढ़क लेते हैं, वहां ऐसा नहीं हो पाता है।

विश्व में हर प्रकार की विविधता के सम्मान की जो व्यावहारिक अवधारणा भारत में पनपी है, और जो आज भी जीवंत है, वैसी अन्य कहीं नहीं मिलेगी। स्वतंत्रता आंदोलन में देश ने अच्छी तरह समझ लिया था कि भारतीयों को बांटने, और अंतत: देश का विभाजन करने में ब्रिटिश शासन ने कैसे-कैसे हथकंडे अपनाए थे। सबसे सशक्त साधन तो उनको 1835 में थामस बैबिंगटन मैकाले ने प्रदान किया था। उन्होंने भारत में अंग्रेजी साम्राज्य को बनाए रखने के लिए जो योजन बनाई, उसका लक्ष्य उनके लिए पूरी तरह स्पष्ट था: ‘हमें ऐसे लोग तैयार करने हैं, जो खून और रंग में भारतीय होंगे, मगर रुचि, राय, नैतिकता और बौद्धिकता में अंग्रेज होंगे।’

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मैकाले की भारत, उसकी संस्कृति और वैश्विक ज्ञान भंडार में उसके योगदान के संबंध में जो राय थी, उसे याद करने से यह समझ में आ जाएगा कि भारतीयों को सूरत से भले ही न सही, दिल से अंग्रेज बना देने में अपनी सफलता के प्रति वह इतना आश्वस्त क्यों था! मैकाले ने भारत की सुव्यवस्थित ज्ञानार्जन प्रणाली और नए ज्ञान की जनहित में उपयोगिता के लिए शोध के प्रति समर्पण की परंपरा को ध्वस्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। परंपरागत स्कूलों और संस्थाओं को उसने यह कहकर नकार दिया कि उन पर सरकार को खर्च करना पड़ेगा, जबकि अंग्रेजी पढ़ाने वाले स्कूलों में लोग अच्छी-खासी फीस देकर आने को तैयार रहते हैं। ऐसा आज भी देश में हो रहा है, और यह लगातार बढ़ रहा है।

स्वतंत्रता के बाद तीन-चार दशकों में न जाने कितने बच्चों ने स्कूल कुछ वर्ष बाद केवल अंग्रेजी सीखने में असफल होने के कारण छोड़ दिए थे। धीरे-धीरे वह स्थिति बदली है, लेकिन आज भी अधिकांश सरकारी नौकरियों में अंग्रेजी का वर्चस्व बना हुआ है। कहा नहीं जा सकता है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में मातृ भाषा पर दिए गए जोर के बावजूद स्थानीय स्तर पर भी नौकरियों में अंग्रेजी का प्रभाव भाषागत भेदभाव का कारण नहीं बनेगा!

वैसे लोग अब घरों में रखे जाने वाले सहायक एवं सहायिकाओं से भी अपेक्षा करते हैं कि उन्हें अंग्रेजी का ज्ञान हो, वे ‘माल’ से सामान मंगा सकें, उसमें मियाद की तारीख पढ़ सके! मैकाले की दूरदृष्टि और भविष्य के आकलन की क्षमता का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है, क्योंकि वह भारतीयों को भारत से अलग करने में कितना सफल रहा, इसे हम आज भी देख रहे हैं। हम आजादी के बाद भी मैकाले के बिछाए जाल से नहीं निकाल पाए, तो इसमें दोष हमारा ही है!

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वैसे भी अब समय मैकाले की आलोचना का नहीं, बल्कि भारतीयों को भारत से पुन: पूरी तरह जोड़ने का है। संभवत: ऐसे ही विचार सर्वोच्च स्तर पर नीति निर्धारकों के भी रहे होंगे, तभी तो देश को मैकाले के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त करने का आह्वान किया गया है। यह भी स्वीकारोक्ति है कि 1835 में मैकाले ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें जमाने के लिए जिस शिक्षा व्यवस्था को तत्कालीन स्वदेशी प्रणाली को नष्ट कर लागू किया, उसके प्रभाव से भारत आज भी मुक्त नहीं हो पाया है।

यह भी एक तथ्य है कि अनगिनत अवसरों पर संसद में चर्चाएं हुई थीं, आश्वासन दिए गए और प्रयास भी हुए, लेकिन बात बनी नहीं! इसका कारण अज्ञात नहीं है, मगर वर्तमान परिस्थितियों के संदर्भ में उसका पुन: विश्लेषण आवश्यक हो गया है। इसके लिए फिर से अपनी जड़ों से जुड़ने की जरूरत को स्वीकार करना होगा। हावर्ड विश्वविद्यालय की ख्याति विश्वव्यापी है और उसे ज्ञान के प्रसार, प्रचार एवं संवर्धन के क्षेत्र में अग्रणी माना जाता है। यहां के दो पुराने छात्र हेनरी डेविड थोरो और राल्फ वाल्डो एमरसन अपने बौद्धिक ज्ञान और उसके योगदान के लिए विश्व प्रसिद्ध रहे हैं। एक बार दोनों अपनी पुरानी मातृ संस्था को लेकर चर्चा कर रहे थे।

एमरसन ने कहा कि अब इस विश्वविद्यालय में ज्ञान की सभी शाखाएं स्थापित हो चुकी है और प्रगति कर रहीं हैं। थोरो ने उत्तर दिया- शाखाओें की बात अति सुंदर है एवं उत्साहजनक है, लेकिन जड़े कैसी हैं, यह जानते रहना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। किसी भी राष्ट्र् की बौद्धिक संरचना को गति और मजबूती देने के लिए सबसे पहले उसकी नींव के टिकाऊ आधार-स्तंभों को जानना और समझना आवश्यक है, ताकि इनके ऊपर आगे की संरचना आधुनिक वैश्विक संदर्भ में निर्मित की जा सके। भारतीय दर्शन में शिक्षा प्रणाली में विद्या, ज्ञान, मेधा, बुद्धि का मुख्य उद्देश्य ऐसे व्यक्ति तैयार करना है, जो नैतिक कसौटी पर भी पूरी तरह खरे उतरें।

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भविष्य के भारत की शिक्षा नीतियां केवल ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण न करें, जो जीवन में सिर्फ धनार्जन और सुख सुविधाओं के संग्रहण को ही शिक्षा प्राप्ति का उद्देश्य मान ले या जिन्हें जीवन के उच्चतम लक्ष्यों और उससे प्राप्त होने वाले ‘सत्, चित, आनंद’ के संबंध में जानकारी न हो, और न ही इसे लेकर कभी कोई प्रेरणा मिली हो। बेहतर शिक्षा से ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण होता है। शिक्षा में मानवीय मूल्यों का होना भी जरूरी है, तभी सामाजिक चेतना का निर्माण होता है।

प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति और संस्कारों की परंपरा व्यक्ति को उसकी आत्मा की उपस्थिति, गरिमा और उसकी विश्व व्यापकता का भान कराती है। यह पद्धति संस्कारों को जीवन-प्रगति के लिए एक आवश्यक तत्त्व मानती है। इसी से व्यक्ति में सत्य और अन्याय की समझ बढ़ती है तथा इसकी खोज में जीवन लगाने में आनंद का आभास होता है।

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