एक नए सर्वेक्षण के अनुसार, जर्मनी के ज्यादातर लोग मानते हैं कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां ‘नाटो’ को खतरे में डाल रही हैं। ‘जेडडीएफ पालिटबैरोमीटर’ सर्वे में शामिल लगभग 78 फीसद लोगों ने कहा कि ट्रंप का रवैया गठबंधन के लिए खतरा है, जबकि 18 फीसद लोग इससे सहमत नहीं थे। बाकी लोगों ने कहा कि वे पक्का नहीं कह सकते।
यह सर्वे ऐसे समय में आया है, जब ट्रंप ग्रीनलैंड पर अमेरिका के दावों पर जोर दे रहे हैं, जो संसाधन से भरपूर आर्कटिक द्वीप है। नाटो सदस्य डेनमार्क का हिस्सा है ग्रीनलैंड, लेकिन उसे काफी आजादी मिली हुई है। इस मसले पर डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन का कहना है कि अगर अमेरिका ग्रीनलैंड पर हमला करता है, तो लंबे समय से चला आ रहा गठबंधन खत्म हो जाएगा।
यह सवाल भी पूछा गया कि अगर अमेरिका आर्थिक संसाधनों को हासिल करने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करते हुए दूसरे देशों में सैन्य हस्तक्षेप करता है, तो यूरोपीय संघ को क्या प्रतिक्रिया देनी चाहिए, तो 69 फीसद लोगों के स्पष्ट बहुमत ने कहा कि यूरोपीय संघ को ऐसे कामों का विरोध करना चाहिए। लगभग 22 फीसद लोगों का मानना है कि ब्रसेल्स को इससे दूर रहना चाहिए, जबकि सिर्फ पांच फीसद लोगों ने कहा कि यूरोपीय संघ को अमेरिका का साथ देना चाहिए।
क्षेत्रफल के हिसाब से ग्रीनलैंड वृहदाकार है। हालांकि अमेरिका, रूस, कनाडा और चीन काफी बड़े हैं, लेकिन ग्रीनलैंड, जर्मनी से लगभग छह गुना बड़ा है। भारत को ग्रीनलैंड से डेढ़ गुना बड़ा माना जा सकता है, लेकिन मर्केटर प्रोजेक्शन वाले मानचित्रों पर ध्रुवों के करीब होने के कारण ग्रीनलैंड अक्सर भारत से बहुत बड़ा दिखता है।
असल में, ग्रीनलैंड पूरे यूरोपीय संघ के आधे से ज्यादा आकार का है और दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, जबकि आस्ट्रेलिया, जिसे यह ताज मिलना चाहिए था, उसे एक महाद्वीप माना जाता है। ग्रीनलैंड के साथ भारत का रिश्ता मुख्य रूप से डेनमार्क के साथ उसकी मजबूत ‘ग्रीन स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप’ यानी हरित रणनीतिक साझेदारी के जरिए आगे बढ़ता है, जो पर्यावरण, अक्षय ऊर्जा और तकनीक पर केंद्रित है। आर्कटिक इलाके में भारत स्थिरता और शांतिपूर्ण बातचीत का समर्थन करता है।
सिर्फ 56,000 निवासियों के साथ ग्रीनलैंड धरती पर सबसे कम आबादी वाला इलाका माना गया है, जहां प्रति वर्ग किमी में लगभग 0.14 लोग रहते हैं। इसकी वजह ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति है। इस देश का 80 फीसद हिस्सा लगभग 30 लाख साल पहले बनी बर्फ की चादर से ढका हुआ है, जिससे बड़े इलाके रहने लायक नहीं हैं।
65 फीसद से ज्यादा आबादी ग्रीनलैंड की पांच नगरों में रहती है। नुक ग्रीनलैंड की राजधानी है। वहां केवल 19,905 लोग रहते हैं। सिसिमियुट (5,485), इलुलिसैट (5,087), काकोर्तोक (3,069) और आसियात में केवल 2,992 लोग रहते हैं। भारत के छोटे से छोटे कस्बे में इनसे कई गुना ज्यादा आबादी मिलेगी।
ग्रीनलैंड की रक्षा की जिम्मेदारी डेनमार्क की है। हालांकि, ग्रीनलैंड को खरीदने या उस पर हमला करने की हालिया धमकियां अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन से जुड़ी हैं, लेकिन यह डेनिश क्षेत्र उससे कहीं ज्यादा समय से अमेरिकी हितों के लिए महत्त्वपूर्ण रहा है। तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री विलियम सेवर्ड ने 1867 में ही ग्रीनलैंड को अपने साथ मिलाने की बात की थी।
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने यह सुनिश्चित करने के लिए ग्रीनलैंड के सामरिक हिस्सों पर कब्जा कर लिया था, ताकि यह नाजी जर्मनी के हाथों में न जाए। अमेरिका वर्तमान में उत्तर-पश्चिमी ग्रीनलैंड के ‘पिटुफिक स्पेस बेस’ का संचालन करता है, जिसे 1951 में अमेरिका और डेनमार्क द्वारा ग्रीनलैंड रक्षा संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद बनाया गया था। साल 2023 में ‘थुले एअर बेस’ का नाम बदलकर ‘पिटुफिक स्पेस बेस’ कर दिया गया था।
चीन ने 2018 में आर्कटिक क्षेत्र में अपनी पकड़ बनाने के प्रयास में खुद को ‘निकट-आर्कटिक राज्य’ घोषित किया। आर्कटिक सर्कल भूमध्यरेखा से उत्तर में लगभग 66.5 डिग्री अक्षांश पर स्थित है, जहां गर्मी के दिनों में चौबीस घंटे सूरज क्षितिज से नीचे नहीं डूबता और सर्दियों में चौबीस घंटे उदय नहीं होता।
यह रेखा आठ देशों—कनाडा, डेनमार्क (ग्रीनलैंड), फिनलैंड, आइसलैंड, नार्वे, रूस, स्वीडन और अमेरिका (अलास्का)—के हिस्सों से होकर गुजरती है। इसके उत्तर का क्षेत्र ‘आर्कटिक’ कहलाता है।
वर्ष 2025 में डेनमार्क और ग्रीनलैंड के भूवैज्ञानिक सर्वे में पाया गया कि द्वीप की बर्फ की चादर लगातार उनतीसवें साल भी सिकुड़ गई है। ‘ग्रीनलैंड आइस शीट’ ने हर साल लगभग 140 बिलियन टन बर्फ खो दी है।
आर्कटिक बर्फ का पतला होना, इस इलाके में बढ़ती दिलचस्पी का एक और मुख्य कारण माना जाता है, खासकर अमेरिका की। ऐसा लगता है कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए एक उत्तर-पश्चिम गलियारा बनाएगा, जिसका मतलब यह हो सकता है कि अमेरिका को ग्रीनलैंड के खनिज संसाधनों तक पहुंच के लिए रूस, चीन और दूसरे देशों के साथ मुकाबला करना पड़ेगा।
ग्रीनलैंड में यूरोपीय संघ यूनियन द्वारा जरूरी माने जाने वाले चौंतीस कच्चे माल में से कम से कम पच्चीस मौजूद हैं। हालांकि, इस इलाके में काफी मात्रा में लौह तत्त्व, ग्रेफाइट, टंगस्टन, पैलेडियम, वैनेडियम, जिंक, सोना, यूरेनियम, तांबा और तेल है, लेकिन सीमित बुनियादी ढांचे के कारण इनमें से ज्यादातर को निकालना मुश्किल है। ग्रीनलैंड के ‘दुर्लभ खनिज’ सबसे ज्यादा मांग वाली चीज है, जिस पर अमेरिका की गिद्ध दृष्टि लगी है।
हाल ही में आठ यूरोपीय देशों ने ग्रीनलैंड में कुछ सैनिक भेजने की हिम्मत की थी, पर ट्रंप द्वारा दस फीसद शुल्क दर लगाने की धमकी के बाद गुस्सा और बढ़ा है। ग्रीनलैंड समर्थक यूरोपीय देशों पर नए शुल्क लगाने की ट्रंप की धमकी के जवाब में यूरोपीय संघ अपने सबसे सख्त व्यापार नियम ‘बजूका’ पर विचार करने पर मजबूर हो गए हैं।
यह कदम अमेरिकी सामानों और कंपनियों को यूरोपीय संघ के बाजार में पहुंच से रोक सकता है। हालांकि नाटो में पहले भी अमेरिका का विरोध होता रहा है, मगर बाद में ‘सुलह’ भी हो जाती है। दरअसल, अमेरिका में इस साल मध्यावधि चुनाव और घरेलू मोर्चे पर ट्रंप की विफलता ने सारा गड्डमड्ड कर डाला है।
उससे सबका ध्यान बंटे, इस वजह से ट्रंप कभी वेनेजुएला, तो कभी ईरान, गाजा, यूक्रेन के मुद्दे को पहाड़ की तरह उठा लेते हैं। ग्रीनलैंड भी ऐसे ही अभियान का हिस्सा है। हालांकि, इसका विरोध अमेरिका में ही शुरू हो चुका है।
अमेरिकी सीनेटरों ने राष्ट्रपति ट्रंप के आर्कटिक आइलैंड ग्रीनलैंड को अमेरिकी नियंत्रण में लाने की योजना की आलोचना की। अलास्का की रिपब्लिकन सीनेटर लिसा मुर्कोव्स्की ने अपनी डेमोक्रेटिक साथी न्यू हैम्पशायर की जीन शाहीन के साथ मिलकर एक विधेयक पेश किया है, जो किसी दूसरे नाटो सदस्य देश के इलाके पर एकतरफा कब्जा करने पर रोक लगाएगा।
मुर्कोव्स्की ने कहा कि यह अब तक का सबसे सफल रक्षा समझौता है, जिसे ट्रंप बाधित कर रहे हैं। यों, ‘यूनिटी प्रोटेक्शन बिल’ सीनेट और उसके बाद प्रतिनिधि सभा में बहुमत के साथ पास होने की उम्मीद कम है। बहुमत का मतलब ट्रंप के विरुद्ध खुली बगावत होगा।
जल्दी ही डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोके रासमुसेन वाशिंगटन में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विदेशमंत्री मार्को रुबियो से ग्रीनलैंड पर अमेरिकी दावों पर बात करने के लिए मिलेंगे। लेकिन लगता नहीं कि ट्रंप इतनी जल्द पीछे हटेंगे। ग्रीनलैंड अमेरिकी कूटनीति का ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’ बन चुका है!
