एक समय था जब शिक्षक समाज का पथप्रदर्शक माना जाता था। आज वही शिक्षक व्यवस्था की हर कमी को पूरा करने वाला सबसे सुविधाजनक संसाधन बनता जा रहा है। सुरक्षा, निगरानी और प्रशासनिक आवश्यकताओं के नाम पर उसे ऐसे कार्य भी करने पड़ रहे हैं, जिनका असल में शिक्षा से कोई सीधा संबंध नहीं है। शिक्षा व्यवस्था में जिस बदलाव की अपेक्षा थी, कई बार उसके विपरीत भी हो रहा है। निश्चित रूप से इसके दूरगामी परिणाम होंगे।
कुछ समय पहले शीर्ष न्यायालय के आदेश के अनुपालन के संदर्भ में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की ओर से उच्च शिक्षण संस्थानों को आवारा कुत्तों से सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देश जारी करने की खबर आई। इस क्रम में सभी विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और विद्यालय परिसरों में आवारा कुत्तों की निगरानी तथा उनसे बचाव के लिए शिक्षकों को जिम्मेदारी सौंपने की भी खबर थी। औपचारिक रूप से यह व्यवस्था सुरक्षा के उद्देश्य से है, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर यह आदेश एक गहरे और असहज प्रश्न को जन्म देता है। क्या शिक्षकों को इस तरह के या अन्य गैर-शिक्षण कार्यों में लगाना शैक्षणिक दायित्वों के अनुरूप है?
शिक्षण कार्य को बेहद जिम्मेदारी का और गरिमापूर्ण कार्य माना जाता है। मगर क्या गैर-शिक्षण कार्य से संबंधित दिशा-निर्देश शिक्षकों की गरिमा के साथ न्याय करते हैं? यह प्रश्न इसलिए और गंभीर हो जाता है, क्योंकि यह कोई पहला अवसर नहीं है। इससे पहले भी शिक्षकों को चुनावी ड्यूटी, जनगणना, पशुगणना, मतदाता सूची का पुनरीक्षण, सत्यापन, सर्वेक्षण, आपदा प्रबंधन, स्वच्छता अभियान, कोविड निगरानी, सामाजिक अभियानों और अन्य अनेक गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगातार लगाया जाता रहा है।
इन परिस्थितियों में यह बहस स्वाभाविक है कि क्या शिक्षक को अब हर प्रशासनिक दायित्व को पूरा करने वाला सुलभ मानव संसाधन मान लिया गया है? सुरक्षा और संवेदनशीलता जैसे मुद्दों की आड़ में अगर शिक्षक को उसके मूल कार्य, यानी पढ़ाने, शोध करने, अकादमिक मार्गदर्शन इत्यादि से निरंतर दूर किया जाएगा, तो इसका दीर्घकालिक प्रभाव केवल शिक्षकों पर नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था और समाज के बौद्धिक भविष्य पर पड़ेगा। यह सवाल अब केवल आदेश की वैधानिकता का नहीं, बल्कि दृष्टिकोण और प्राथमिकता का भी है।
किसी भी राष्ट्र में शिक्षक की गरिमा का क्षरण उस समाज की आत्मबोधहीनता का संकेत होता है। शिक्षक की उपेक्षा किसी एक वर्ग का अपमान नहीं, बल्कि वह उस विचार की उपेक्षा होती है कि ज्ञान, विवेक और प्रश्न पूछने की क्षमता किसी समाज के लिए कितनी आवश्यक है। अगर हम शिक्षक से निरंतर ऐसे कार्य करा रहे हैं जो उसकी पेशागत पहचान को धुंधला करते हैं, तो यह आत्मचिंतन आवश्यक है कि क्या हम अनजाने में शिक्षा को नहीं, बल्कि शिक्षक को ही अप्रासंगिक बना रहे हैं!
आज जिस सहजता के साथ शिक्षकों को आवारा पशुओं की गिनती, निगरानी और नियंत्रण जैसे कार्यों में लगाने की खबरों को लिया जा रहा है, वह किसी साधारण प्रशासनिक निर्णय का परिणाम नहीं है। यह उस मानसिकता का उद्घाटन है, जिसमें शिक्षक की भूमिका को क्रमश: गौण और सुविधाजनक उपयोगितावादी बना दिया गया है। जिन कार्यों के लिए नगर निगम, नगरपालिका परिषद और ग्राम पंचायतों में पृथक कर्मचारी, विभाग और बजट निर्धारित हैं, उन्हीं कार्यों के लिए शिक्षकों को खड़ा कर देना यह संकेत देता है कि व्यवस्था की दृष्टि में शिक्षक का समय, श्रम और बौद्धिक क्षमता उनके लिए कोई मायने नहीं रखती, बल्कि शिक्षक अब सबसे सस्ता विकल्प बन चुके हैं।
जिस शिक्षक से समाज विवेकशील नागरिक तैयार करने की अपेक्षा करता है, उसी को आज यह अप्रत्यक्ष संदेश दिया जा रहा है कि उसका मूल दायित्व पढ़ाना, शोध करना, विचार और प्रश्न गढ़ना अब प्राथमिकता की सूची में नहीं है। कक्षा में विद्यार्थी हैं या नहीं, शिक्षण की गुणवत्ता लगातार क्यों कम होती जा रही है? शोध हो रहा है या नहीं, इससे अधिक महत्त्वपूर्ण यह माना जा रहा है कि जहां प्रशासनिक तंत्र अपने किसी कार्य को करने में असफल हो जाए, वहां उसकी भरपाई के लिए शिक्षक को आसानी से लगा दिया जाए।
यह स्थिति केवल पेशागत गरिमा का हनन नहीं, बल्कि शिक्षा को एक कमतर महत्त्व की गतिविधि मान लेने की प्रवृत्ति को उजागर करती है। विडंबना यह है कि जिस समाज में शिक्षक को कभी गुरु, आचार्य और राष्ट्र निर्माता कहा गया, उसी समाज में उसे ऐसा बहुउद्देशीय सरकारी श्रमिक समझ लिया गया है, जिससे बिना किसी अतिरिक्त प्रशिक्षण और उचित पारितोषिक के कोई भी काम करवाया जा सकता है। चुनावी ड्यूटी हो, सर्वेक्षण, निरीक्षण, पर्यवेक्षण या सत्यापन हो, हर जगह शिक्षकों को आगे कर दिया जाता है।
यह धारणा धीरे-धीरे स्थापित की जा रही है कि शिक्षक ज्ञान का स्रोत नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलताओं को ढोने वाला एक आज्ञाकारी माध्यम है। इस दृष्टिकोण में शिक्षक की पहचान बौद्धिक पूंजी के रूप में नहीं, बल्कि संकट-प्रबंधन के सुलभ संसाधन के रूप में होती जा रही है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इस निरंतर अपमान के बीच शिक्षक समुदाय की चुप्पी स्वयं एक सवाल बन चुकी है।
यह चुप्पी केवल विवशता की नहीं, बल्कि उपेक्षा के साथ समझौता कर लेने की आदत का संकेत भी है। जब शिक्षक अपने सम्मान के सवाल पर मौन साध लेता है, तब समाज और व्यवस्था दोनों यह मान लेते हैं कि यह स्थिति न केवल स्वीकार्य है, बल्कि स्थायी भी है। यहीं से शिक्षा के क्षरण की प्रक्रिया शुरू होने लगती है।
यदि हम विकसित देशों की ओर दृष्टि डालें, तो हमें एक अलग तस्वीर दिखाई देती है। फिनलैंड में शिक्षक बनना केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और बौद्धिक जिम्मेदारी का प्रतीक है। वहां शिक्षक को गैर-शैक्षणिक सरकारी कार्यों में लगाना लगभग असंभव माना जाता है, क्योंकि वहां पर राज्य यह समझता है कि शिक्षक का समय सीधे राष्ट्र के भविष्य से जुड़ा है।
इसी प्रकार जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में शिक्षक न केवल आर्थिक रूप से सुरक्षित हैं, बल्कि सामाजिक रूप से भी अत्यंत सम्मानित हैं। वहां शिक्षक से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह व्यवस्था की कमियों की भरपाई करे, बल्कि यह अपेक्षा की जाती है कि वह बच्चों की क्षमता, अनुशासन और नवाचार को आकार दे।
इन देशों की प्रगति किसी चमत्कार का परिणाम नहीं है, बल्कि उस स्पष्ट समझ का परिणाम है जो यह मानती है कि शिक्षक को यदि कक्षा से हटाया गया, तो राष्ट्र दिशा से भटक जाएगा। वहां शिक्षकों से पशुओं की गणना और निगरानी नहीं करवाई जाती, बल्कि संभावनाओं की गिनती करवाई जाती है।
वहीं यह स्वीकार किया गया है कि शिक्षक का अपमान दीर्घकाल में राष्ट्र के लिए एक खतरे का संकेत है। अंतत: यह सवाल किसी एक आदेश, किसी फाइल या किसी विभाग तक सीमित नहीं है, यह उस बौद्धिक आत्मा का प्रश्न है जिसे हम राष्ट्र के रूप में गढ़ रहे हैं। जब शिक्षक से उसका मूल धर्म छीन कर उसे व्यवस्था की असफलताओं का मूक वाहक बना दिया जाता है, तब शिक्षा उपेक्षित ही नहीं होती, बल्कि अज्ञान को संस्थागत वैधता मिल जाती है। क्या कोई समाज सचमुच प्रगति की आकांक्षा कर सकता है, जहां शिक्षक कक्षा में नहीं, बल्कि सड़कों पर अन्य कार्य करता हुआ अधिक उपयोगी समझा जाए?
