Morale & Mental Health: जीवन एक अथाह समुद्र के समान है- कभी शांत, कभी उग्र। जीवन में परिस्थितियों की लहरें जब उठती हैं तो मनुष्य के भीतर छिपे भय, आशंकाएं और अनिश्चितताएं सतह पर आ जाती हैं। ऐसे प्रतिकूल समय में जो एकमात्र साधन हमें डूबने से बचाए रखता है, वह है मनोबल। मनोबल दरअसल उस नौका की तरह है जो भयंकर तूफानों के बीच भी हमें दिशा देती है, संतुलन सिखाती है और किनारे तक पहुंचने की उम्मीद बनाए रखती है।

साधन अल्प और अपर्याप्त हों, परिस्थितियां विपरीत हों तथा भविष्य धुंधला दिख रहा हो, फिर अगर मनोबल सुदृढ़ है, तो यात्रा की सफलता सुनिश्चित है। मनोबल कोई जन्मजात उपहार नहीं है, बल्कि यह अनुभवों, विश्वासों और मूल्यों से निर्मित एक जीवंत शक्ति है। यह आत्मविश्वास से थोड़ा-सा अलग है, लेकिन उसके साथ गहराई से जुड़ा है।

यह भी पढ़ें: खामोश अन्याय और टूटता हुआ सामाजिक विवेक

आत्मविश्वास अक्सर क्षणिक उपलब्धियों से पोषित होता है, जबकि मनोबल दीर्घकालिक धैर्य, संकल्प और आशा से निर्मित होता है। जब पराजय सामने खड़ी हो, तब क्षण भर के लिए आत्मविश्वास तो डगमगा सकता है, लेकिन मनोबल हाथ थामे रखता है और कहता है। आज प्रतिस्पर्धा की तीव्रता, सूचना का अतिभार, सामाजिक तुलना और त्वरित सफलता के दबाव ने मन को अस्थिर बना दिया है।

असफलता को जीवन का स्वाभाविक पड़ाव मानने के बजाय उसे यात्रा का अंत समझ लिया जाता है। इसलिए मनोबल की नौका बार-बार डगमगाती है। तूफान तो आएंगे ही। प्रश्न यह है कि हमारे मनोबल की नौका कितनी मजबूत है। जिसके जीवन में उद्देश्य सुस्पष्ट होता है, उसके लिए बड़ी से बड़ी कठिनाइयां और विषम परिस्थितियां भी अर्थपूर्ण हो जाती हैं। निश्चित और दिशायुक्त उद्देश्य संघर्ष को भी निश्चित दिशा प्रदान करता है।

उद्देश्य कोई बहुत विशाल लक्ष्य ही हो, यह आवश्यक नहीं है। उद्देश्य के रूप में ईमानदारीयुक्त श्रम, सेवा-भाव या आत्म-विकास का संकल्प भी हो सकता है। दूसरा महत्त्वपूर्ण आधार है अनुशासन और नियमितता। मनोबल आकस्मिक प्रेरणा से नहीं, बल्कि सतत और नियमित अभ्यास से सुदृढ़ होता है। समय पर उठना, कार्य को टालने की प्रवृत्ति से बचना तथा छोटे-छोटे लक्ष्यों को पूरा करना- ये सब मन के भीतर विश्वास का निर्माण करते हैं।

यह भी पढ़ें: क्या मनुष्य अपनी संवेदना खोता जा रहा है?

प्रत्येक कृतपूर्ण लघु लक्ष्य मनोबल की नौका में एक मजबूत पटरा जोड़ देता है। तीसरा आधार है- सकारात्मक संवाद। हम स्वयं से क्या कहते हैं, यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। नकारात्मक आत्मसंवाद मनोबल को भीतर से खोखला कर देता है। इसके विपरीत, यथार्थवादी और आशामय संवाद, जो कठिनाइयों को अंगीकार करते हुए समाधान खोजता है, मनोबल की नौका के लिए पतवार की भूमिका अदा करता है।

एक बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि यहां विवेकरहित आशा नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण तथा उद्देश्यपरक आशा की बात है।चौथा आधार है- परस्पर सहयोग, समन्वय और संबंध। मनोबल की नौका दरअसल एक पतवार से नहीं चलती। इसको गति प्रदान करने के लिए अनेक पतवारों का होना अनिवार्य है। परिवार, मित्र, समाज और सहकर्मी- ये सभी हमारे मनोबल की नौका के सहयात्री हैं।

संकट में साझा किया गया दुख परिमाण में आधा रह जाता है और साझा की गई आशा परिमाण में दोगुनी हो जाती है। समाज में संवाद और संवेदना का अभाव मनोबल को कमजोर करता है, इसलिए स्वस्थ संबंधों का निर्माण नितांत आवश्यक है। धैर्य व्यक्ति को समय के साथ तालमेल बिठाकर चलना सिखाता है, नौका को लहरों के साथ संतुलन में रखता है। धैर्य का अर्थ निष्क्रियता नहीं, निरंतर, लेकिन बिना विचलित हए शांतिपूर्वक प्रयत्न है।

यह भी पढ़ें: महिला अपराधों पर समाज का दोहरा रवैया और चुनिंदा आक्रोश

यह एक ऐसा अमूल्य गुण है जो व्यक्ति को थकान के क्षण में भी उत्साहपूर्वक एक कदम और बढ़ाने की शक्ति देता है। आध्यात्मिकता भी मनोबल की नौका को आवेग प्रदान करती है। यहां आध्यात्मिकता से आशय किसी संकीर्ण धार्मिक अर्थ में नहीं, बल्कि जीवन के व्यापक अर्थ-बोध के रूप में है। जब व्यक्ति अपने जीवन को किसी बड़े उद्देश्य से जोड़ता है, तब छोटी असफलताएं उसे तोड़ नहीं पातीं।

उद्देश्य की ओर देख कर ही मनोबल की दिशा तय होती है। बिना उद्देश्य के मनोबल क्षणिक एवं अस्थायी होता है, जबकि उद्देश्य के साथ वह दीर्घकालिक रूप ग्रहण कर लेता है। मनोबल की नौका की गतिशीलता को बनाए रखने के लिए स्वयं की देखभाल अनिवार्य है। शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन, पर्याप्त विश्राम और ध्यान- ये सभी मन के महासागर में उठने वाली लहरों को शांत करते हैं। थका हुआ मन छोटी-सी चुनौती में भी घबरा जाता है, जबकि संतुलित मन बड़े से बड़े संकट का बखूबी सामना कर सकता है।

मनोबल की नौका हमें यह सिखाती है कि जीवन में तूफानों से बचना तो संभव नहीं है, लेकिन उनके बीच डूबना भी अनिवार्य नहीं। मनोबल गिरने के बाद उठने का साहस देती है, असफलता के बाद भी प्रयास की सततता के लिए प्रेरणा देती है। जब मनोबल सुरक्षित एवं सशक्त होता है, तब भविष्य भय का नहीं, संभावनाओं का समुद्र बन जाता है।

यह भी पढ़ें: सहानुभूति तक सीमित हो गई संवेदना, ठहर गया है सामाजिक आचरण

आज के परिवेश में आवश्यकता है कि हम व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर मनोबल की नौका को सुदृढ़ करें, क्योंकि मजबूत मनोबल ही वह आधार है, जिस पर समृद्ध समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण होता है। लहरें आती रहेंगी, समुद्र भी उग्रता को धारण किए रहेगा, लेकिन मनोबल की नौका मजबूत है, तो यात्रा बिना किसी व्यवधान के अवश्य पूरी होगी।