कोई भी व्यक्ति हो, उसके भीतर करुणा-संवेदना, स्नेह, मानवता इत्यादि सहज गुण विद्यमान रहते हैं। एक बेहद सख्त दिखने वाले मनुष्य के भीतर भी ये नैसर्गिक गुण होते ही होते हैं। यह और बात है कि अनेक लोग जानबूझ कर अपने भीतर की सहज अनमोल थाती से अनजान बने रहते हैं और निर्ममता के साथ समाज में जीते रहते हैं। किसी के साथ हिंसा करते हैं, कहीं लूटपाट करते हैं। ऐसे अनेक लोग बुनियादी तौर पर अपनी हरकतों को अपनी विशेष कथित बहादुरी के रूप में ही देखते हैं।
अपने बुरे कर्मों के कारण ऐसे लोग एक दिन गिरफ्तार भी होते हैं, जेल जाते हैं, जेल से बाहर आते हैं और फिर उसी बुरे काम में लग जाते हैं। इनके भीतर कोई आत्मज्ञान नहीं आता। दरअसल, इनकी अंतर्निहित करुणा पूरी तरह सुप्त-सी रहती है। यह और बात है कि ऐसे लोग जब अपने घर पहुंचते हैं, तो अपनी छोटी बच्ची या बच्चे को प्रेम से उठाते हैं, चूमते हैं, प्यार करते हैं। उनकी हर इच्छा की पूर्ति करते हैं। लेकिन बाह्य जगत के लिए क्रूर व्यक्ति होते हैं।
गुंडे-बदमाशों की तरह एक सफेदपोश वर्ग भी ऐसा है, जो समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करते हुए अपना कारोबार करता है। खूब धनार्जन करता है। मगर इनमें से कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो कारोबार की आड़ में अपराध करते हैं और जिनके बारे में काफी विलंब से लोगों को पता चलता है। इनमें से कुछ ऐसे हैं जो खाने-पीने की चीजें बनाते हैं और उनमें खुल कर मिलावट करते हैं।
इन्हें इस बात का भी दर्द नहीं होता कि चार पैसे अधिक कमाने के चक्कर में वे न जाने कितने लोगों के जीवन से खेल रहे हैं। मजे की बात है कि ये लोग अपना नियमित ‘धंधा’ भगवान की पूजा करने के बाद शुरू करते हैं और समापन प्रणाम करके। उन्हें ऊपर वाले का भी कोई खौफ नहीं होता कि वह देख रहा है।
जीवन-रक्षक दवाओं में भी मिलावट की जानकारी आए दिन मिलती रहती है। तब समाज और चकित होता है कि व्यावसायिक पतन कहां तक हो चुका है। पैसे कमाने के लिए लोग जहर बेचने में भी संकोच नहीं करते। ऐसे लोग देश-दुनिया में हर जगह मिल जाएंगे। कई लोग मनुष्य होते हुए भी अमानुष बने रहते हैं। सड़कों पर आए दिन कुछ ऐसे लोग हमें नजर आते हैं जो किनारे बैठे किसी कुत्ते को लात जमा देते हैं। किसी कुत्ते को ऊंची छत से फेंक देते हैं। या राह चलती सीधी-सादी गाय या किसी बैल को डंडा मार देते हैं। कभी-कभी चोट खाए जानवर के मामले में दांव उल्टा पड़ जाता है और वह डंडा मारने वाले को उठाकर पटक देता है।
समाज में इस तरह का एक ऐसा वर्ग है, जिसे हम परपीड़क कह सकते हैं। उसे दूसरों को पीड़ा पहुंचाने में आनंद आता है। कोई भी पशु हो, उसको प्रताड़ित करने में उसे असीम आनंद की अनुभूति होती है। शायद इसे ही शैतान की प्रवृत्ति कहा जाता है। ऐसे लोग हर जगह अपने से कमजोर तबके को पीड़ा पहुंचाते हैं। हमारे यहां शुरू से कहा गया है कि ‘बड़े भाग मानुष तन पावा’, लेकिन मनुष्य तन पाने के बावजूद अमानुष बन जाना सामाजिक व्यवस्था को चरमराने की कोशिश करने जैसा है। प्रश्न यह है कि आखिर समाज में कुछ लोग इतने निर्मम क्यों हो जाते हैं? क्यों किसी को पीड़ा पहुंचाते हैं?
इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि इन्होंने अपने धर्मग्रंथों का ठीक से अध्ययन-मनन नहीं किया है। उनकी सामाजिकता की पृष्ठभूमि ने उनके भीतर ऐसी संवेदना निर्मित नहीं की, जिसके सहारे वे दूसरों के प्रति मानवीय हो सकें और साथ ही खुद को मानवीय संवेदनाओं से लैस कर सकें।
हालांकि ऐसे लोग दूसरों को मौके-बेमौके नुकसान पहुंचाते हैं या फिर पहुंचाना चाहते हैं, लेकिन अक्सर इसका नुकसान उन्हें भी उठाना पड़ता है। जब वे खुद को नुकसान में पाते हैं, तब शायद वे इसके कारणों पर विचार करते हों। धर्म कोई भी हो, वह मानवता का संचार करने का ही संदेश देता है। जिन परिवारों में बच्चों को बाल्यकाल से ही ऐसे संस्कार मिलते हैं, वे बड़े होकर नेक राह पर चलते हैं। अगर व्यवसाय करेंगे, तो ईमानदारी का ध्यान रखेंगे। मिलावट से बचेंगे।
सामाजिक जीवन में रहेंगे, तो एक श्रेष्ठ नागरिक की तरह आचरण करेंगे। जीवन जगत के अनेक मोर्चे पर कार्यरत लोग अगर नैतिक दृष्टि से शिक्षित रहेंगे तो कभी भी अपने हृदय में व्याप्त करुणा, दया-ममता आदि से दूर नहीं हो सकते। मगर जो लोग इस पर विचार ही नहीं करना चाहते, उनके बारे में कोई भी कुछ नहीं कर सकता। फिर भी यह संतोष की बात है इस महादेश में आज भी अनेक लोग पशुओं के प्रति बेहद संवेदनशील दिखते हैं। यानी वे जीव-दया के पक्षधर नजर आते हैं। उस दिशा में कुछ न कुछ काम करते रहते हैं। किसी मनुष्य पर कहीं कोई अत्याचार होता है, तो एक बड़ा वर्ग प्रतिरोध करने खड़ा हो जाता है।
इसलिए हमारे यहां यह भी कहा गया है कि यह दुनिया अच्छे लोगों से भरी पड़ी है। ऐसे लोगों की संख्या निरंतर बढ़नी चाहिए। यह तभी संभव है, जब हम नई पीढ़ी को उन सद्ग्रंथों की ओर मोड़ें, जो मनुष्य को और बेहतर मनुष्य बनाने की बात करते हैं। हर व्यक्ति को अपने स्तर पर आसपास के परिवेश में संवेदना के जागरण की दिशा में बिना बोले चुपचाप काम करते रहना चाहिए। इसका असर तभी संभव है, जब व्यक्ति खुद वैसा आचरण या उदाहरण पेश करे।
