मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ का पात्र हामिद आज भी हम सबकी स्मृति में है। याद कीजिए हामिद के हाथ में खिलौने नहीं हैं। उस पर मेले की चमक-दमक का दबाव तो है, फिर भी वह अपनी दादी अमीना की अंगुलियों को चूल्हे की आग से बचाने के लिए लोहे का चिमटा खरीदता है। उस उम्र में हामिद पर न तो ‘अच्छा प्रदर्शन’ करने का दबाव है, न दूसरों से आगे निकलने की होड़। उसकी समझ, संवेदना और परिस्थिति ही उसका मार्गदर्शन करती है।

इस कहानी में मेले का यह प्रसंग हमें याद दिलाता है कि बचपन मूलत: तुलना, प्रतिस्पर्धा और परिणाम का नहीं, बल्कि समझ, सहानुभूति और धीरे-धीरे सीखने का समय होता है। मगर आज का बचपन उस हामिद से बहुत दूर खड़ा दिखाई दे रहा है, जहां बच्चों से उम्मीद की जाती है कि वे कम उम्र में ही हर मोर्चे पर बेहतर साबित हों। यहीं से यह सवाल उठता है कि क्या हम बच्चों से वह छीन रहे हैं, जो बचपन का सबसे जरूरी हिस्सा है। बेहतर करने के दबाव ने आज के बच्चों की मानसिक स्थिति पर गहरे से वार किया है।

आज बच्चों पर ‘अच्छा करने’ का दबाव केवल परीक्षा और अंकों तक सीमित नहीं रह गया है। विद्यालय, घर और समाज तीनों जगह उनसे निरंतर बेहतर साबित होने की उम्मीद की जाती है। बेहतर अंक, बेहतर रैंक, बेहतर स्कूल, बेहतर करिअर, यह क्रम बचपन को भी एक अंतहीन दौड़ में बदल देता है। समस्या यह नहीं है कि बच्चों से मेहनत की अपेक्षा की जाती है। समस्या यह है कि असफलता को सीख नहीं, बल्कि कमजोरी मान लिया जाता है। यही सोच धीरे-धीरे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालती है।

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण और अन्य अध्ययनों से संकेत मिलता है कि भारत में बच्चों और किशोरों में चिंता, अवसाद तथा तनाव से जुड़ी समस्याएं बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका एक बड़ा कारण लगातार अच्छा प्रदर्शन करते रहने का दबाव है। बच्चे अपने आप को केवल परिणामों के आधार पर आंकने लगते हैं। पढ़ाई में पिछड़ना, किसी परीक्षा में असफल होना या अपेक्षित स्तर तक न पहुंच पाना उन्हें स्वयं के प्रति अत्यधिक कठोर बना देता है।

उम्र के साथ यह दबाव अपना रूप बदलता है। प्राथमिक स्तर पर बच्चों से अपेक्षा होती है कि वे अनुशासन में रहें, जल्दी सीखें और हर काम सही ढंग से करें। इस उम्र में बच्चा अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाता, इसलिए उसका तनाव व्यवहार में दिखता है, चिड़चिड़ापन, चुप्पी या डर के साथ वह जीने लगता है। आगे की कक्षाओं में पहुंचते-पहुंचते उसकी तुलना और प्रतिस्पर्धा और तेज हो जाती है। सहपाठियों से आगे निकलने की दौड़, कोचिंग और अतिरिक्त कक्षाओं का बोझ बच्चों की सहज जिज्ञासा को भी दबाने लगता है। किशोरावस्था में यह दबाव और गहरा हो जाता है। बोर्ड परीक्षा, कालेज में दाखिला और करिअर की चिंता बच्चों को घेर लेती है।

राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि आत्महत्या के मामलों में 15-29 वर्ष का आयु वर्ग सबसे अधिक प्रभावित है और इनमें शैक्षणिक दबाव, परीक्षा में असफलता तथा अपेक्षाओं का बोझ प्रमुख कारणों में शामिल हैं। लड़कियों के संदर्भ में यह समस्या और जटिल है। पढ़ाई के साथ-साथ उनसे सामाजिक अपेक्षाएं भी जुड़ जाती हैं, संयम, सुरक्षा, जिम्मेदारी और कई बार घरेलू कार्यों का बोझ उनके लिए लड़कों से ज्यादा दबाव में डालने लगता है। आंकड़े बताते हैं कि देश में किशोरियों में खून की कमी और पोषण की समस्या व्यापक है, जिसका सीधा असर सीखने की क्षमता और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। इसके बावजूद लड़कियों के मानसिक तनाव और दबाव पर चर्चा नहीं होती।

बच्चों की दुनिया अब पहले जैसी नहीं रही। खेल केवल मैदान तक सीमित नहीं हैं। फिटनेस, योग, मार्शल आर्ट और यहां तक कि ‘ई-स्पोर्ट्स’ भी बच्चों को अपनी क्षमता पहचानने के नए अवसर दे रहे हैं। इसी तरह मोबाइल और डिजिटल तकनीक को केवल भटकाव मानना वास्तविकता को नजरअंदाज करना है। आनलाइन कक्षाएं, शैक्षणिक ऐप, डिजिटल पुस्तकालय और कौशल-आधारित मंच सीखने के तरीके बदल चुके हैं।

पढ़ाई अब केवल किताब और परीक्षा तक सीमित नहीं रही, बल्कि समझ, प्रयोग और रचनात्मकता को भी महत्त्व मिलने लगा है। इन बदलावों के बीच सबसे बड़ा सवाल माता-पिता की सोच से जुड़ा है। पुराने पैमानों यानी अंक, रैंक और तुलना से बच्चों की क्षमता को आंकना आज के समय के साथ मेल नहीं खाता। हर बच्चा एक जैसा नहीं सीखता, न ही एक दिशा में आगे बढ़ता है।

किसी बच्चे की रुचि खेल में है, किसी की कला में, किसी की तकनीक में। यह अभिवावक को समझना होगा। जब माता-पिता बच्चों को केवल एक तय ढांचे में फिट करने की कोशिश करते हैं, तो वही दबाव जन्म लेता है, जो आगे चल कर तनाव और असफलता का कारण बनता है। सरकार और शैक्षणिक संस्थान भी अब इस समस्या को पहचानने लगे हैं। स्कूलों में परामर्श, हेल्पलाइन और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रमों की शुरुआत एक सकारात्मक संकेत है। मगर संस्थागत प्रयास तब तक पर्याप्त नहीं हो सकते, जब तक घर का वातावरण सहयोगी न हो। बच्चे सबसे पहले घर में सुरक्षित महसूस करना चाहते हैं, जहां वे बिना डर के अपनी बात कह सकें, अपनी असफलताओं को साझा कर सकें।

आप सोच कर देखिए कि एक छात्र जो विज्ञान की किताबों से इतर मिट्टी के खिलौने बनाते हुए ज्यादा खुश हो रहा है, उसका पारिवारिक माहौल क्या होगा? इसी तरह संगीत में डूबे रहने वाले एक बच्चे के माता-पिता अगर उसी पुरानी सोच के आधार पर बच्चे से कुछ अलग की उम्मीद करेंगे, तो यह उसका मानसिक शोषण ही होगा।

इसलिए बच्चों पर अलग से बोझ नहीं डालना चाहिए। उन्हें यह अवसर दें कि वे वही करें, जिसमें उनकी स्वाभाविक रुचि और क्षमता है, क्योंकि हर बच्चे का सीखने और आगे बढ़ने का तरीका अलग होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि बच्चों को पूरी तरह बिना दिशा के छोड़ दिया जाए। उन्हें मार्गदर्शन और निगरानी की भी आवश्यकता होती है, लेकिन यह निगरानी नियंत्रण या डर के माध्यम से नहीं, बल्कि समझ और संवाद के माध्यम होनी चाहिए। जब बच्चे यह महसूस करते हैं कि उनकी बात सुनी जा रही है और उनके निर्णयों में भरोसा रखा जा रहा है, तब वे दबाव में नहीं, बल्कि आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते हैं और अपनी जिम्मेदारियों को भी बेहतर ढंग से समझ पाते हैं।

ऐसे में बच्चों और माता-पिता के बीच संवाद और भरोसा सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है। अनुभव और उत्साह के बीच संतुलन तभी संभव है, जब दोनों एक-दूसरे को सुनें और समझें। ‘हामिद’ को फिर से याद कीजिए, उसके पास विकल्प बहुत थे, लेकिन उसने अपनी परिस्थिति के अनुसार खुद की जरूरत चुनी थी।