किसी भी देश के तेज आर्थिक विकास के लिए वहां व्यवसाय सुगमता जरूरी है। इसलिए यह आवश्यक है कि व्यवसाय शुरू करने, चलाने और बंद करने की प्रक्रियाओं को सरल, कुशल तथा लागत-प्रभावी बनाया जाए, ताकि नियामकीय जटिलताओं तथा प्रशासनिक बाधाओं को कम किया जा सके और निवेशकों को आकर्षित किया जा सके। साथ ही आर्थिक विकास को भी बढ़ावा मिले।
विश्व बैंक का ‘व्यवसाय सुगमता सूचकांक’ देशों की व्यवसाय सुगमता को मापता है। इसके लिए वह व्यवसाय शुरू करने, अनुमति पत्र प्राप्त करने, बिजली-पानी की सुविधा, कर भुगतान, ऋ ण उपलब्धता, अनुबंध लागू करने और सीमा-पार व्यापार जैसे मानकों के आधार जांच करके उन देशों को वर्गीकृत करता है। व्यवसाय सुगमता सूचकांक में भारत को इस वर्ष 190 देशों में से 63वां स्थान मिला है। पिछले वर्ष यह 77वें स्थान पर था। इस वर्ष भारत ने चौदह स्थान का सुधार किया है।
व्यवसाय सुगमता का उद्देश्य कारोबार के लिए पूरे जीवनकाल में नियमों, परमिट और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलता तथा समय को कम करने के साथ ही अनुकूल विनियामक वातावरण बनाना है, जो संपत्ति अधिकारों को स्पष्ट करे और विवादों को सुलझाने की लागत कम करे।
इसका उद्देश्य एकल इलेक्ट्रानिक मंच बनाना, कागज रहित व्यवस्था करना और डिजिटल कर प्रणाली के माध्यम से प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना है। उच्च रैंकिंग देश की छवि को सुधारती है, निवेश आकर्षित करती है और वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ देती है। व्यवसाय की सुगमता वर्तमान वैश्विक परिवेश को देखते हुए बहुत जरूरी है। इसके लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों, नियामक संस्थाओं, व्यवसायिक संगठनों और व्यवसायियों के साझा प्रयास जरूरी हैं।
देश में अधिकांश व्यावसयिक गतिविधियों का संचालन कंपनी स्वरूप में होता है। इनमें भी छोटी कंपनियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। व्यवसाय सुगमता छोटी कंपनियों के लिए और जरूरी हो जाती है, ताकि वे कम से कम कानूनी औपचारिकताओं के साथ अपना कार्य संचालन कर देश की अर्थव्यवस्था में अपना अहम योगदान कर सकें।
एक दिसंबर 2025 से कई उपाय किए गए
हाल में कारपोरेट कार्य मंत्रालय ने छोटी कंपनियों के लिए अनुपालन का बोझ कम करने के उद्देश्य से एक दिसंबर 2025 से कई उपाय किए हैं। छोटी कंपनियों के लिए चुकता पूंजी का मानदंड चार करोड़ रुपए से बढ़ा कर दस करोड़ रुपए और कारोबार का मानदंड चालीस करोड़ रुपए से बढ़ा कर सौ करोड़ रुपए कर दिया है। इससे अपेक्षाकृत अधिक पूंजी वाली कंपनियां भी छोटी कंपनी की श्रेणी में आ जाएंगी और उन पर भी अनुपालन का बोझ कम हो सकेगा।
कंपनी अधिनियम 2013 के अंतर्गत तकनीकी और प्रक्रिया संबंधी उल्लंघनों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का कार्य अधिनियम में संशोधन के माध्यम से दो चरणों में किया गया है। इस तरह कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत 51 प्रकार के मामलों को अपराध की श्रेणी से हटा दिया गया है। इसके अलावा सीमित देयता साझेदारी अधिनियम 2021 के अंतर्गत 12 प्रकार के मामलों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है।
इस संशोधन से अदालतों और राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण पर इस तरह के मामलों का बोझ कम करने में सहायता मिलेगी और व्यवसायी भी तनावमुक्त होकर अपने व्यवसाय का कुशल संचालन कर सकेगा। व्यवसाय सुगमता की दृष्टि से छोटे-छोटे उपक्रमों का आपस में विलय भी होता रहता है, इनके त्वरित विलय के दायरे को फरवरी 2021 में विस्तारित किया गया, ताकि एक नवउद्यम का अन्य लघु कंपनियों के साथ विलय आसानी से हो सके।
सितंबर 2025 में इस दायरे को और विस्तृत किया गया, ताकि ज्यादा कंपनियां इस आपसी विलय के साथ सुगमता पूर्वक अपने कार्य का संचालन कर सकें। इसके अलावा, समयबद्ध तरीके से अनुमोदन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से त्वरित विलय के लिए ‘मानित अनुमोदन’ की व्यवस्था शुरू की गई है। इसके अंतर्गत शर्तें पूरी होने पर दो या अधिक उपक्रमों का स्वत: विलय मान लिया जाता है। व्यवसाय सुगमता के लिए राहें इसीलिए आसान की गई हैं।
भारतीय सार्वजनिक कंपनियों द्वारा स्वीकृत विदेशी क्षेत्राधिकारों में प्रतिभूतियों को सीधे सूचीबद्ध करने की अनुमति दे दी गई है। इससे उत्पादों को एक बड़ा प्रोत्साहन मिलता है और पूंजी का वैकल्पिक स्रोत प्राप्त होता है तथा निवेशक आधार को व्यापक बनाने में मदद मिलती है। यदि कोई छोटी कंपनी अपने कंपनी स्वरूप से बाहर निकलना चाहे, तो इसके लिए त्वरित कारपोरेट निकासी प्रसंस्करण केंद्र की स्थापना मई 2023 में की गई। इसका उद्देश्य हितधारकों को उनकी कंपनियों और सीमित दायित्व साझेदारी के नामों को रजिस्टर से समय पर और प्रक्रियाबद्ध तरीके से हटाने के लिए परेशानी मुक्त ‘फाइलिंग’ प्रदान करना और उन्हें सक्षम बनाना है।
व्यापार सुगमता को बढ़ावा देने, अनुपालन को मजबूत करने, पारदर्शिता बढ़ाने और ‘कारपोरेट फाइलिंग’ को सुव्यवस्थित करने के लिए समुचित प्रावधान किए गए हैं। अब सभी फाइलिंग इसी प्रणाली के माध्यम से की जा रही हैं, जो पहले से भरे हुए ‘मास्टर डेटा’ के साथ वास्तविक समय पर सत्यापन प्रदान करता है। इससे मानवीय त्रुटियां और अनुपालन की समय सीमा कम हो जाती हैं। हितधारकों को मार्गदर्शन के लिए नियमित रूप से वेबिनार और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
पोर्टल पर ‘वीडियो ट्यूटोरियल’, ‘चैटबाट’ और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न उपलब्ध हैं, जो उपयोगकर्ताओं को रिटर्न दाखिल करने में सहायता करते हैं। यह पोर्टल एक ‘डैशबोर्ड’ की सुविधा प्रदान करता है, जो हितधारकों को भुगतान में सक्षम बनाता है। इससे पारदर्शिता बढ़ती है। पोर्टल से संबंधित शिकायतों के निवारण के लिए सहायता केंद्रस्थापित किया गया है। व्यवसाय सुगमता कंपनी प्रारूप के अतिरिक्त अन्य प्रारूपों में संचालित होने वाले उपक्रमों के लिए भी जरूरी है। इस दृष्टि से भी प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।
छोटे स्तर पर शुरू किए जाने वाले व्यवसायों के पंजीकरण और अन्य क्रियाकलापों का सरलीकरण करने की दृष्टि से एकल विंडो प्रणाली लागू की जा सकती है, जिससे व्यापारियों को एक ही स्थान पर सभी आवश्यक सेवाएं मिल सकें। व्यापारिक प्रक्रियाओं को डिजिटल बनाने और ई-गवर्नेंस लागू करने जैसे उपाय भी आवश्यक हैं, ताकि व्यापारियों को आनलाइन सेवाएं मिल सकें। व्यावसायिक नियमों और विनियमों को सरल तथा स्पष्ट बनाया जाना चाहिए।
छोटे स्तर पर व्यापार करने वालों को पूरी तरह से कर मुक्त किया जाए
छोटे स्तर पर व्यापार करने वालों को या तो पूरी तरह से कर मुक्त किया जाए या उन पर बहुत कम कर बोझ हो, साथ ही कर प्रणाली को सरल बनाया जाए, ताकि व्यापारियों को आसानी हो। जिन व्यवसायों में किसी प्रकार के लाइसेंस या परमिट की व्यवस्था है, वहां इस प्रक्रिया को या तो समाप्त कर दिया जाए या उनको सरल बनाया जाए, ताकि व्यापारियों को जल्दी से जल्दी लाइसेंस एवं परमिट मिल सकें। जो व्यवसाय आनलाइन माध्यम से संभव हों उनके लिए आभासी व्यापार मंच बनाए जाएं, जिससे व्यापारियों को परस्पर आनलाइन व्यापार करने में आसानी हो। ऐसे बहुत से व्यवसाय हैं, जिनमें व्यापारियों के लिए व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण की जरूरत रहती है। लिहाजा उनके लिए समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए, ताकि वे अपना कारोबार और बेहतर ढंग से चला सकें।
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