कई बार लोग कहते हैं कि हम आपको समझते हैं… आपकी पीड़ा, आपके दुख और तकलीफ, भावनाओं को समझते हैं। ऐसे शब्द अक्सर सुनने को मिल जाते हैं। कई बार हमारे बहुत करीबी, रिश्ते-नातेदार अपनी निकटता दिखाने के लिए कहते हैं कि हम आपके दुख, आपकी पीड़ा को समझते हैं। उनका यह कहना वास्तव में मात्र जुबानी जमा खर्च होता है, जिसे कोई भी किसी को सांत्वना देने के लिए आमतौर पर औपचारिकता निभाने की खातिर कह देता है। हालांकि ऐसा कहना एक तरह की कठोरता है, लेकिन ज्यादातर मामलों में सच यही है।
अगर हम एक इंसान के रूप में थोड़े-से संवेदनशील हैं, तो हम किसी के दुख के प्रति भावुक हो सकते हैं। हो सकता है कि उसके दुख से हम थोड़े बहुत दुखी भी हो जाएं, पर पूरी तरह किसी के दुख, पीड़ा, मर्म को समझ पाना लगभग असंभव है। एक हद तक अगर संभव है भी, तो यह तब हो पाता है, जब कोई व्यक्ति खुद उसी के बराबर की पीड़ा से गुजरा होता है।
किसी को समझना और किसी की पीड़ा की गहराई में उतरना क्या आसान है? इंसान का दुख एक अंधेरे गहरे कुएं की तरह होता है। उस अंधेरे और गहराई में कितनी तहें हैं, यह कोई नहीं जानता है। बाहर से देखने पर कुछ और लगता है और अंदर उतरने पर कुछ और भी हो सकता है। और जब कोई चीज दिखाई ही नहीं दे रही, तो हम सिर्फ अंदाजा लगा सकते हैं, सौ फीसद क्या है, यह हम नहीं बता सकते।
ऐसा भी नहीं है कि हम किसी के दुख के कुएं में कूद जाएं। जाने के लिए भावनाओं की एक पूरी नदी पार करनी पड़ती है। अपनत्व की सीढ़ी बनानी पड़ती है। संवेदना से अपनी हृदय-भूमि को सिंचित करना पड़ता है। उसके बाद एक-एक सीढ़ी उतरना पड़ता है। वह भी बेहद संभल-संभल कर, तब जाकर कहीं नीचे तक हम पहुंचने की राह मिल पाती है। अगर हम जरा भी जल्दबाजी और अनमनापन दिखाते हैं, तो आधे रास्ते से वह सीढ़ियां गायब हो जा सकती हैं और वहीं से हमें वापस आना पड़ जा सकता है।
जुबान भले ही कुछ भी कहे, लेकिन वास्तव में देखा जाए, तो ऐसा बिल्कुल भी संभव नहीं है कि कोई किसी की पीड़ा को पूरी तरह से समझ ले। जिस रूप में व्यक्ति पीड़ा को भोग रहा है, उसी रूप में, उन्हीं भावनाओं के साथ कोई महसूस कर ले। क्या यह संभव है? अपने पांव पर चलने वाला पूरी तरह स्वस्थ इंसान साल भर से बिस्तर पर अशक्त रूप से पड़े हुए किसी इंसान के मन के दुख को किस तरह समझ सकता है।
पूरी तरह स्वस्थ तो छोड़ दिया जाए, जो उस अवस्था से गुजर रहा है, वह व्यक्ति भी उस व्यक्ति की पीड़ा को सौ फीसद नहीं समझ सकता है, क्योंकि हो सकता है कि दोनों की परिस्थितियां अलग हों। हम किसी की पीड़ा का मात्र कुछ अंश ही समझ सकते हैं, पूरी तरह समझना असंभव है, क्योंकि जो व्यक्ति पीड़ा भोग रहा है, वह पूरे समय इस दुख में जीता है।
और जो व्यक्ति समझने का दावा कर रहा है कि उसकी पीड़ा को समझ रहा है, वह मात्र उस व्यक्ति के समंदर-से दुख के मात्र एक कतरे को समझने का प्रयास कर रहा है। यह कतई संभव नहीं है कि हम एक पूरी किताब को एक पन्ना पढ़कर समझ जाएं। किसी के दुख को पूरी तरह या पर्याप्त गहराई के साथ समझने के लिए उस किताब को पूरा पढ़ना पड़ेगा।
उसी परिस्थिति में पढ़ना पड़ेगा और उसी अवस्था, भावना में पढ़ना पड़ेगा और उतना ही समय लेना पड़ेगा। तब जाकर हो सकता है कि कहीं हम किसी व्यक्ति की पीड़ा की तहों में पहुंच पाएं।
इसीलिए यह संभव नहीं है कि हम कितने भी संवेदनशील व्यक्ति हों, किसी के दुख को समझ सकते हैं। दुख-सुख दरअसल परिस्थिति, भावनाओं, अपनों के व्यवहार के अलावा भी बहुत सारी बातों के साथ मिलकर संगति करता है। एक पति-पत्नी बरसों साथ रहते हैं। एक खुशहाल परिवार के रूप में रहते हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि दोनों एक दूसरे की पीड़ा को पूरी तरह समझते हों।
अक्सर हम लोगों को उतना ही समझते हैं, जितनी हमें आवश्यकता होती है। उसके बाद अन्यथा के रूप में छोड़ देते हैं। हर इंसान को हर रिश्ते में सबसे बड़ा दुख या फिर शिकायत यही होती है कि सामने वाला हमें समझ नहीं रहा है। इसलिए जितना जल्दी हो सके, अपने आप को यह बात समझा लेना चाहिए कि हमारे दुख को सौ फीसद कोई नहीं समझ सकता, क्योंकि बहुत बार हम खुद नहीं समझ सकते हैं कि हम क्या चाहते हैं, क्योंकि दुख भी रूप बदलता रहता है।
यों भी, यह हम दूसरों से कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि दूसरा एकदम हमारे मन के अनुरूप हमारी बात, भावना, पीड़ा को समझ पाएगा। अगर कोई हमारी बातों को, भावनाओं को कुछ हद तक भी समझ जाता है, तो यह मान लेना चाहिए कि उस व्यक्ति को हमारी परवाह, हमसे लगाव और प्रेम है।
उसे रिश्ते को प्रसन्नता के साथ जीने का प्रयास करना चाहिए। किसी की भावना, पीड़ा या दुख, किसी की समझ, सोच को समझना दरअसल एक जटिल, बेहद थकाने वाला काम है। भागती-दौड़ती इस दुनिया में यह उम्मीद करने की जरूरत नहीं है कि कोई हमें पूरी तरह समझ पाएगा, क्योंकि यह उम्मीद पालना ही एक नए दुख को जन्म दे देगा। और मन में कड़वाहट उपजेगा, वह अलग दुख होगा। थोड़े को ही पूरा मानना हमें सहज और सरल बनाएगा, जो सुखी मन से जीने के लिए जरूरी है।
