केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में स्थित रिहायशी, व्यावसायिक और औद्योगिक प्रॉपर्टी के सर्किल रेट 20% कम कर दिए हैं। दिल्ली में प्रॉपर्टी लेने वालों के लिए यह खुशखबरी है। यह आदेश 30 सितंबर 2021 तक प्रभावी रहेगा। डिप्टी सीएम मनीष सिसौदिया ने कहा कि केजरीवाल सरकार का यह बड़ा फैसला है। यह रियल एस्टेट को BOOST करने का काम करेगा तो जमीन खरीदने वाले लोगों को इससे बड़ी राहत मिलेगी।

सर्कल रेट के मुताबिक, जमीन की कीमत को तय करने का अधिकार सरकार के पास सुरक्षित है। सरकार रजिस्ट्रार या सब रजिस्ट्रार के जरिए जमीन की कीमतें मार्केट मूल्य के आधार पर तय करती है। इसके लिए मार्केट के साथ जिले के विकास को भी आधार बनाया जाता है। तय सर्कल रेट के आधार पर ही कोई व्यक्ति जमीन की खरीद-फरोख्त कर सकता है। उसके आधार पर ही सब रजिस्ट्रार दफ्तर जमीन खरीदने वाले व्यक्ति से स्टांप शुल्क वसूलते हैं।

दिल्ली में प्रॉपर्टी को ए से लेकर एच तक की आठ श्रेणियों में विभाजित किया गया है। सबसे महंगी जमीन ए कैटेगरी में होती है जबकि जमीन की सबसे कम कीमत एच कैटेगरी में होती है। सरकार आम तौर पर रिहायशी इलाकों में सर्कल रेट कम रखती है जबकि कमर्शियल में यह अपेक्षाकृत ज्यादा होता है। दिल्ली के लिहाज से देखा जाए तो यहां एक ही इलाके में फ्लैट, जमीन की रजिस्ट्रेशन वेल्यू में काफी अंतर है।

southdelhiprime.com के दीपेश गर्ग का कहना है कि इससे उन सेलर्स को फायदा मिलेगा जो न्यू फ्रेंड्स कालोनी, फ्रेंड्स कालोनी, महारानी बाग, वसंत विहार और आनंद निकेतन जैसे इलाकों में काम कर रहे हैं। यहां जमीन का बाजार भाव सर्कल रेट से कम है। उनका कहना है कि सरकार के इस फैसले का लंबे अर्से से इंतजार था। ए कैटेगरी में पड़ने वाली जमीनों के मामले में यह काफी अहम फैसला है, क्योंकि यहां सर्कल रेट जमीन की वास्तविक कीमत से ज्यादा है। yns associate के युद्धिष्ठ सिंह का कहना है कि यह आदेश काफी कम समय के लिए जारी किया गया है। इसे और लंबे समय तक प्रभावी किया जाना जरूरी है। इससे जमीन के खरीदारों और सेलर्स को फायदा मिलेगा।

गौरतलब है कि रियल्टी क्षेत्र के शीर्ष संगठन क्रेडाई ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि पिछले 18 माह के दौरान देशभर में मकानों के दाम औसतन 15 से 20 प्रतिशत तक गिर गए हैं। इसमें आगे और कटौती की गुंजाइश नहीं है। क्रेडाई के अध्यक्ष गीतांबर आनंद ने सुस्त पड़े रियल एस्टेट क्षेत्र में जान फूंकने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों से टैक्स स्ट्रक्चर को रैशनल बनाने और परियोजनाओं को मंजूरी देने के लिए वन विंडो क्लियरंस फसिलटी उपलब्ध कराने पर जोर दिया है।