Zakir Husain Delhi College: दिल्ली के जाकिर हुसैन कॉलेज ने 300 सालों से अधिक अपने इतिहास में कई दौर की जिंदगी जी है। इसमें मुगल शासन, कंपनी राज, 1857 का विद्रोह, ब्रिटिश साम्राज्य, विभाजन और स्वतंत्रता शामिल है। इस कॉलेज के ऐतिहासिक सफर में जहां एक मुगल-युग का मदरसा भी शामिल है तो वहीं दिल्ली कॉलेज को 1857 के विद्रोह के दौरान लूटा भी गया था। उस दौरान इसे बंद कर दिया गया था।
इसके अलावा इस कॉलेज ने और भी कई वीभत्स अनुभवों का सामना किया। 20वीं सदी में एंग्लो-अरबी इंटरमीडिएट कॉलेज को विभाजन के दौरान आग लगा दी गई थी। बाद में 1948 में इसका फिर से निर्माण किया गया और 1975 में डॉ जाकिर हुसैन के नाम पर जाना गया। आगे चलकर 2010 में इसे जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज हो गया।
इसकी शुरुआत में मदरसा अजमेरी गेट के पास 18वीं शताब्दी में गाजीउद्दीन खान द्वारा शुरू किया गया था। हालांकि आगे चलकर इसे चलाने में आर्थिक तंगी के चलते यह सुचारू रूप से चल न सका। वहीं ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के 1813 के चार्टर के बाद इसे फिर शुरू किया। शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए इसके लिए सालाना एक लाख रुपये आवंटित किए गए।
1827 में सरकार द्वारा यूरोपीय सिद्धांतों को मदरसे में शामिल किया और अंग्रेजी, खगोल विज्ञान और गणित की कक्षाओं को शुरू करने के लिए एक अतिरिक्त राशि स्वीकृत की गई। इसके बाद से ये दिल्ली कॉलेज के रूप में जाना जाने लगा। गौरतलब है कि कॉलेज की वेबसाइट के मुताबिक 1845 में कॉलेज में 460 छात्रों में से 299 हिंदू थे, 146 मुस्लिम थे और 15 ईसाई थे।
यह एंग्लो-अरबी इंटरमीडिएट कॉलेज 1925 में दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध था और 1929 में इसे एक डिग्री कॉलेज के तौर मान्यता मिली। हालांकि इस दौर के बाद कॉलेज को हिंसक रूप का सामना करना पड़ा और विभाजन के दौरान इस पर हमले हुए गया और आग भी लगाई गई। वहीं विभाजन के बाद हुई हिंसा से मिले जख्म जहां एक तरफ भर रहे थे तो वहीं दूसरी तरफ 1948 में दिल्ली के पुनरुद्धार को लेकर एक अलग अध्याय शुरू हुआ।
मिर्जा महमूद बेग को कॉलेज का हेड बनाया गया। दरअसल विभाजन के बाद हुए पलायन में कई विस्थापित सिंधी परिवारों ने बेग से कहा कि उनकी बेटियों को शिक्षा की जरुरत है। वहीं जब 1948 में कॉलेज फिर से खुला तो उस दौरान 80 फीसदी छात्र सिंधी लड़कियां थीं। इसकका विरोध भी बेग को उठाना पड़ा। इसमें पुरानी दिल्ली के बड़े समुदाय ने बेग के खिलाफ अपना रुख दिखाया।
कॉलेज के पुराने परिसर में 1930 के दशक से एक संगमरमर की गोली है। जिसको लेकर कहा जाता है कि इस परिसर का निर्माण अधिक संख्या में छात्रों के बैठने के लिए किया गया था।
