ऐसा अनुभव तो आपवादिक ही माना जाएगा कि एक पूरा साल बीतने को है पर साल के शुरुआत में ही महामारी के रूप में आया संकट अब भी बीता नहीं है, न ही इस संकट के कारण देश-समाज का अनुभव आगे एक बेहतर दौर की उम्मीद बढ़ा रहा है। अलबत्ता, इस बीच मानव सभ्यता ने गरीबी से लेकर नफरती हिंसा तक कई ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण अनुभव अपने हिस्से जोड़ लिए जो आधुनिकता, विकास और समृद्धि के तमाम दावों को सामने से आईना दिखाते हैं।
अब जबकि यह साल बीतने को है तो यह देखना जरूरी है कि अंतिम तौर पर हमारे खाते जो आया है, वह तजुर्बे और सबक के तौर पर हमें क्या सिखाता है। कोरोना के कोहरे में घिरे 2020 में भारत के साथ विश्व समाज से जुड़े विभिन्न संदर्भों और हवालों को सामने
ला रहे हैं प्रेम प्रकाश।
मैंने निचोड़कर दर्द
मन को
मानो सूखने के खयाल से
रस्सी पर डाल दिया है
कोरोना संकट से जूझते हुए दुनिया ने खोया तो बहुत कुछ लेकिन इस दौरान कुछ पाया भी है। उसके इस पाने में शब्दों और अनुभूति की उस दुनिया में लौटना शामिल है, जहां किताबें हैं, लेखक हैं, उनके ढेर सारे अनुभव हैं। कविता की जिन पंक्तियों का ऊपर जिक्र है, वे भवानीप्रसाद मिश्र की कविता ‘बेदर्द’ की हैं। मिश्र की ये पंक्तियां समय को देखने का एक नया नजरिया है, एक नया रचनात्मक पक्ष है।
वे समय को कैलेंडर या पंचांग के उत्तरायण या दक्षिणायन में बीतते नहीं देखते बल्कि अपने भीतर से गुजरते देखते हैं। कष्ट और संघर्ष के बीच से निकला कवि उम्मीद को जीने वाला है, इसलिए आगे इसी कविता में वो कहता है, ‘और मन सूख रहा है/ बचा-खुचा दर्द जब उड़ जाएगा/ तब फिर पहन लूंगा मैं उसे।’ साल 2020 का बीतना तकलीफ और संकट के ऐसे ही अनुभव से गुजरना है, जहां अगर कुछ शेष है तो वह है आशा और हर हाल में जिंदगी के सााथ खड़े होने की जीवट इच्छा।
सभ्यता का संकट
कोविड-19 का संकट सिर्फ सेहत का वैश्विक संकट नहीं है बल्कि यह सभ्यता का संकट भी है। इसलिए इससे निपटने की राह व्यक्ति, समाज और आचरण से होकर कहीं ज्यादा गुजरेगी। एक तरह से आगाह करने वाली इस समझ से कई तत्व चिंतकों ने बहुत पहले अवगत करा दिया था। दुखद यह रहा कि जो बात विश्व समाज और दुनिया भर की सरकारों को बहुत पहले समझ लेनी चाहिए थी, उसे लेकर नासमझी अब तक बनी हुई है।
महामारी के जिस संकट के बीच प्रकृति अपने स्वच्छ और निथड़े रूप में सामने आई, उस प्रकृति से मिले जीने के समन्वयी सबक को हम अपने जीवन में नहीं उतार सके। इसके उलट कोरोनाकाल में दुनिया भर में जिस तरह हिंसा और दुर्भावना के अनुभव सामने आए, वे सभ्यता और विकास के हमारे हर दावे के खिलाफ जाते हैं। नस्लीय हिंसा, महिला उत्पीड़न , बच्चों के साथ असंवेदनशील सलूक, तालीम से लेकर रोटी तक गरीबों के प्रति दिखे तंग नजरिए जैसे अनुभव एक महामारी को सामाजिक संक्रमण के भी तौर पर देखने की दरकार सामने रखते हैं।
हिंसा और भय
2020 का वर्ष अपनी जिस एक छवि के साथ लंबे समय तक याद आएगा, वह अमेरिका में अश्वेत युवक जॉर्ज फ्लायड की हत्या है। 25 मई को अमेरिका के मिनीपोलिस में एक पुलिस अधिकारी डेरेक चाउविन ने अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड के गले को घुटनों से कई मिनट तक दबाए रखा था, जिसके कारण उसकी मौत हो गई थी।
इस घटना के खिलाफ विरोध में देखते-देखते अमेरिका के सौ से ज्यादा शहर दहक उठे, वहीं दुनिया के कई देशों में नस्लीय हिंसा के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए। आलम यह रहा कि ब्रिटेन में इस दौरान औपनिवेशिक दौर में अश्वेत दमन के बर्बर नायकों की मूर्तियों को गिराया जाने लगा।
अच्छी बात यह रही कि इस बीच विश्व समाज ने उस फकीर को याद करना भी जरूरी समझा, जो अपनी हत्या से पूर्व तक विश्व मानवता को करुणा और प्रेम के साथ निर्भय होने का संदेश दे रहा था। महात्मा गांधी के सबक और मानवता के लिए की गई उनकी प्रार्थनाओं की शरण में जाकर इस दौरान कई चिंतकों ने सभ्यता और विकास के बीच मानवीय सुदृढ़ता के सूत्र बताए। इस लिहाज से डॉ अभय बंग का दिया एक भाषण काफी महत्वपूर्ण है, जिसमें वे कोरोना के संकट से उबरने के लिए नौ अहिंसक सूत्र बताते हैं।
उत्पीड़न का घर
मन और दिमाग पर कई गहरी खरोंच देकर विदा हो रहा यह वर्ष उस भय के लिए भी निस्संदेह याद किया जाएगा, जिसमें लोगों को महामारी के संक्रमण से बचने के लिए लंबे समय तक घरों में कैद होकर रहना पड़ा। इस दौरान सड़कें या तो वीरान दिखीं या फिर उन पर उन कामगारों की पदयात्रा जिन्हें शहरों ने संकट के समय पनाह देने से इनकार कर दिया।
घर पर रहना और परिवार के साथ समय बिताना कोई बुरा अनुभव नहीं होना चाहिए। पर हुआ ऐसा ही। आजीविका के संकट ने लोगों को मानसिक तौर पर तोड़कर रख दिया। यह टूटन शहरों से लेकर गांव तक हर तरफ दिखा। नतीजतन, घरेलू हिंसा जैसी बर्बरता दुनिया के हर हिस्से में देखने को मिली। संयुक्त राष्ट्र की महिला इकाई और यूनिसेफ के आंकड़ों के मुताबिक ‘लॉकडाउन’ के तीन महीनों में पूरी दुनिया में करीब 1.5 करोड़ महिलाओं ने घरों में हिंसा का सामना किया।
संकट का मानस
महामारियों के इतिहास में कोरोना जैसे संकट का सामना दुनिया पहली बार कर रही है। एक तो इसका प्रसार क्षेत्रीय न होकर वैश्विक है, वहीं साल के आखिर तक इसके संक्रमण के नए-नए प्रकार सामने आते जा रहे हैं। ऐसे में इससे निपटने की चुनौती मनोवैज्ञानिक रूप में भी बड़ी है। दुनिया भर में इसे लेकर कई तरह के अध्ययन भी सामने आए हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन और संयुक्त राष्ट्र ने भी माना है कि मनोवैज्ञानिक तौर पर लोगों की देखभाल बड़ी चुनौती है। इसके लिए सरकार और समाज दोनों को पहल करनी चाहिए। इंडियन सायकाइट्री सोसाइटी (आइपीएस) के हालिया सर्वे में पता चला है कि ‘लॉकडाउन’ लागू होने के बाद से मानसिक बीमारियों के मामले 20 फीसद बढ़े हैं और हर पांच में से एक भारतीय इनसे प्रभावित हैं।
आइपीएस ने चेतावनी दी है कि भारत में हाल के दिनों में कई कारणों से मानसिक संकट का खतरा पैदा हो रहा है। इनमें रोजी-रोटी छिनना, आर्थिक तंगी बढ़ना, अलग-थलग होना और घरेलू हिंसा बढ़ना शामिल हैं। ये कारण इतने बड़े हैं कि किसी व्यक्तिको आत्महत्या के लिए भी उकसा सकते हैं।
‘सेंटर फॉर मेंटल हेल्थ, लॉ एंड पॉलिसी’ के निदेशक सौमित्र पठारे कहते हैं कि हालात का सामना करने की हमारी सबकी एक सीमा है और अगर ज्यादा समय तक बहुत ज्यादा तनाव रहे तो हम उससे निपटने की अपनी क्षमता खो देते हैं। साफ है कि परिवार, समाज और सरकार सबको एक ऐसा माहौल अपने आसपास बनाना पड़ेगा जिसमें न तो लोगों की निराशा बढ़े और न ही ऐसा लगे कि कोई अकेला या लाचार है तो उसकी मदद के लिए कोई सामने नहीं आएगा।
सहयोग का नवाचार
अच्छी बात यह है कि कोरोना संकट के दौरान विश्व के साथ भारतीय समाज ने सामाजिक सद्भाव और सहयोग के कई ऐसे नवाचारी सुलेख रचे जिसमें आगे बढ़कर एक-दूसरे की हर तरह की मदद का जज्बा पूरे समर्पण के साथ दिखा।
इतने महीने बीत जाने के बाद भी भोजन से लेकर चिकित्सकीय सलाह और दवा वितरण जैसी सेवाएं आज भी जारी हैं। यही नहीं, यह नवाचार बच्चों की शिक्षा तक को जारी रखने के लिए अलग-अलग नवाचार के तौर पर देखने को मिले। ये अनुभव ऐसे हैं जिससे उम्मीद बंधती है कि संकट चाहे जितना भी गहरा हो सहयोग और समाज का सभ्यतागत साझा इसका साहस से मुकाबला करेगा।
