छत्तीसगढ़ भर के सरकारी स्कूलों में मिड डे मील तैयार करने वाले कुक, अपनी दैनिक मजदूरी को 66 रुपये से बढ़ाकर 340 रुपये करने की मांग को लेकर न्यू रायपुर के एक मैदान में 21 दिनों से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं। यह कुक विरोध करने वाली जगह पर बैचों में पहुंचते हैं और लगभग तीन दिनों तक वहां पर रहते हैं। इसके बाद दूसरे लोग उनकी जगह ले लेते हैं।
टूटा में मौजूद नया विरोध स्थल तंबुओं से भरा हुआ था। यहां पर प्रदर्शनकारी ठहरते हैं। एक लोकल वेंडर भी वहां पर मौजूद है। छत्तीसगढ़ स्कूल मध्याभोजन रसोइया संयुक्त संघ के एसोसिएशन सेक्रेटरी मेघराज बघेल ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “मैं पिछले 30 सालों से मिड डे मील के कुक के तौर पर काम कर रहा हूं। गुजारा करना मुश्किल हो गया है। मैंने अपने बच्चों की पढ़ाई पूरी करने के लिए 90000 रुपये का लोन लिया है। जब मैंने 1995 में काम शुरू किया था, तो हमें रोज 15 रुपये मिलते थे और अब हम रोज 66 रुपये पर अटके हुए हैं। यह अन्याय है। एक और समस्या यह है कि अगर किसी स्कूल में बच्चों की संख्या कम हो जाती है, तो वे हमारी नौकरी खत्म कर देते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए।”
बघेल ने बताया कि उनका पहला विरोध 2003-2004 में शुरू हुआ था और छह साल के विरोध के बाद रोजाना की मजदूरी बढ़ाकर 33 रुपये यानी महीने के 1000 रुपये कर दी गई थी। 2019 और 2023 में मजदूरी फिर से बढ़ाई गई, जिससे यह रोज 66 रुपये यानी महीने के 2000 रुपये हो गई। बघेल ने कहा, “हमारी पहली मांग है कि हमें महीने के 11400 रुपये या कम से कम रोज 340 रुपये दिए जाएं।”
जिस दिन मेरी बेटी की मौत हुई, उस दिन भी काम किया- सुकृता चव्हाण
बघेल ने कहा कि कुक पर हर दिन काम करने का दबाव होता है और उन्होंने उस दिन भी काम किया था जिस दिन उनके पिता की मौत हुई थी। एक और प्रदर्शनकारी, सुकृता चव्हाण ने भी इसी तरह की चिंता जताई। उन्होंने कहा, “मैंने 2024 में जिस दिन मेरी बेटी की मौत हुई, उस दिन भी काम किया था। हमें बहुत सारी समस्याएं हैं, लेकिन सरकार सुनने को तैयार नहीं है।”
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राजनांदगांव की रहने वाली चव्हाण ने कहा, “मैं 2003 से काम कर रही हूं, तब हमें रोज 15 रुपये मिलते थे। मुझे अक्टूबर से मजदूरी नहीं मिली है। मेरे पति मजदूर हैं। मेरी दो और बेटियां हैं और हमने उनकी पढ़ाई पूरी करने के लिए लोन लिया है। सरकार को लगता है कि हमें सिर्फ दो घंटे काम करना होता है, लेकिन हम सुबह 10 बजे चावल धोने और साफ करने से शुरू करते हैं। दाल, चावल, सब्जी, पापड़ और अचार बनाने के बाद, हमें खाना परोसने और फिर बर्तन धोने में भी मदद करनी पड़ती है। काम दोपहर 3 बजे तक खत्म होता है। अगर स्कूल में कोई फंक्शन होता है, तो हम शाम 4 बजे तक काम करते हैं। 2013 में, मैं अकेले 170 बच्चों के लिए खाना बनाती थी और अब मैं 60 बच्चों के लिए खाना बनाती हूं।”
हम बंधुआ मजदूरों की तरह हैं- पंकज प्रमाणिक
एक और प्रदर्शनकारी कांकेर के पंकज प्रमाणिक ने कहा, “हम बंधुआ मजदूरों की तरह हैं। किसी भी चुनाव के दौरान, हमसे खाना बनवाया जाता है। उसके लिए हमें पैसे नहीं मिलते। कोविड के बाद, उन्होंने जून के आखिरी 15 दिनों का पेमेंट देना बंद कर दिया, यह कहते हुए कि उन्हें केंद्र सरकार से सिर्फ 10 महीनों के लिए पैसे मिलते हैं और ये 15 दिन एडजस्ट हो जाते हैं क्योंकि हमें स्कूल की छुट्टियों में छुट्टी मिलती है।”
प्रमाणिक ने कहा, “हम अच्छे कपड़े खरीदने से बचते हैं। हम टमाटर खाने से बचते हैं। हम देखते हैं, लेकिन खरीदते नहीं हैं। हमारे लिए सब कुछ महंगा होता जा रहा है।” धमतरी की शकुंतला सेन ने कहा कि उनके परिवार को घर चलाने में दिक्कत हो रही है। उन्होंने कहा, “मेरे दो बच्चे, जिनकी उम्र 19 और 20 साल है, उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया है क्योंकि मेरे पास उन्हें आगे पढ़ाने के लिए पैसे नहीं हैं। मेरे पति किसान हैं।”
कांकेर की शिप्रा तरफदार ने कहा कि खाना बनाने वालों के साथ “आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और मितानिनों की तरह सम्मान से पेश नहीं आया जाता, जिन्हें उनके काम के लिए सम्मानित किया जाता है।” एक सरकारी सूत्र ने एक्सप्रेस को बताया, “उनकी मजदूरी 1000 रुपये प्रति माह बढ़ाने का प्रस्ताव है, जिसका मतलब है कि कुल मजदूरी 3000 रुपये प्रति माह हो जाएगी। लेकिन इस पर अभी कोई फैसला नहीं लिया गया है।”
