अशोक बंसल

भिन्न क्षेत्रों में यश और धन कमाने वाले अनेक भले मानुष अपने जीवन की संध्या बिताने भगवान कृष्ण की क्रीड़ा स्थली वृंदावन में आ बसते हैं, लेकिन दर्शन, धर्म, ज्योतिष आदि के विद्वान 75 साल के डॉ रामदयाल मैदुली को वृंदावन रास नहीं आया। डॉ मैदुली पिछले दिनों वृंदावन छोड़कर किसी अन्य स्थान पर चले गए। न जाने कितने नामी-गिरामी लोगों ने डॉ मैदुली का शिष्य बन वेदों के ज्ञान का मर्म जाना। ऐसे लोगों में केंद्रीय मंत्री उमा भारती भी शमिल हैं। वृंदावन में रिक्शा चलाकर, बेलदारी कर और फिर गुरुकुल विश्वविद्यालय में चपरासी की नौकरी से जीवन की शुरुआत कर केंद्र सरकार के विज्ञापन व दृश्य प्रचार निदेशालय में एक बड़े अधिकारी के पद पर कार्य कर चुके डॉ रामदयाल मैदुली सन 1960 में चमोली, गढ़वाल से 11 साल की अवस्था में अकेले वृंदावन आए थे। दाने-दाने को मोहताज मैदुली ने मेहनत-मजदूरी कर पेट भरा। तभी वृंदावन के गुरुकुल विश्वविद्यालय में चौकीदार रख लिए गए। कखग से भी कोसों दूर रहने वाले रामदयाल जब वेदों और गुरुओं-छात्रों के सानिध्य में रहे तो उनके जीवन ने अप्रत्याशित करवट ली। भाषा की वर्णमाला को पहचानना शुरू किया, लगन और स्वाध्याय ने कमाल दिखाया। हाईस्कूल किया, इंटरमीडिएट किया और बीए करने के बाद दर्शन शास्त्र, प्राचीन इतिहास, संस्कृत में एमए किया, पीएचडी की। इस दैरान ट्यूशन भी पढ़ाई।

डॉ मैदुली ने बताया कि पुस्तकें सबसे अच्छी और वफादार मित्र साबित हुईं। धर्म और दर्शन के मर्म को समझना शुरू किया तो वृंदावन के नामी धमर्गुरुओं का सानिध्य मिला। स्वामी अखंडानंद, स्वामी कृष्णनन्द आदि के आश्रम में रहने का अवसर मिला। स्वामी कृष्णनन्द के आश्रम में उमा भारती (केंद्रीय मंत्री) को वेदों की शिक्षा देने की बात उन्हें आज भी याद है।
डॉ. मैदुली ने एक दिन अचानक अखबार में नौकरी का विज्ञापन पढ़ा। आवेदन भेजा और फिर आकर्षक नौकरी पा ली। सरकारी नौकरी में रहते रामदयाल मैदुली अपने विषय और स्वाध्याय से कभी नहीं भटके। ज्योतिष शास्त्र में महारत हासिल कर ली लेकिन पद और ज्ञान का गुरूर उनके पास नहीं फटका। जो कुछ सीखा, पढ़ा, देखा, भोगा उसमें मौलिक चिंतन का मिश्रण किया और फिर लेखन में जुट गए।

विश्व के प्रमुख धर्मों की कहानी पुस्तक का उल्लेख रामदयाल मैदुली की विद्वता का प्रमाण देने के लिए पर्याप्त है। मैदुली अपनी आत्मकथा मेरी भवसागर यात्रा के लेखन में व्यस्त हैं।
मैदुली कान्हा की क्रीड़ा स्थली वृंदावन में कुकरमुत्तों की तरह पैदा हुए धर्म भुनाऊ विद्वानों की हरकतों से भलीभांति वाकिफ हैं, लेकिन उनके लिए महत्त्वपूर्ण यह नहीं कि दुनिया क्या कर रही है, उनके लिए महत्त्वपूर्ण यह है कि उनको क्या करना चाहिए। डा. मैदुली जबतक वृंदावन में रहे एकदम गुमनामी में रहे।