उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव होने में अब थोड़ा ही समय बाकी है और इसी बीच केंद्र सरकार द्वारा लिए गए नोटबंदी के फैसले की देशभर में चर्चा हो रही है। ऐसे में यह फैसला निश्चित ही उत्तर प्रदेश की राजनीति पर असर डालने वाला है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक आगामी विधानसभा चुनाव में यह फैसला बीजेपी की ताकत को बढ़ाने वाला है।
समाचार एजेंसी रॉइटर्स के इस आकलन के मुताबिक नोटबंदी के फैसले से भले ही लोगों को कई तरह की परेशानियां झेलनी पड़ी हो लेकिन अनुमान है कि यह बीजेपी को सिर्फ शॉर्ट टर्म में ही नुकसान करेगा। केंद्र सरकार के इस फैसले ने तमाम विपक्षी दलों को चुनाव के लिए नए सिरे से अपनी रणनीति बनाने के लिए मजबूर कर दिया है। कोई भी राजनीतिक दल देश की सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य को जीतने की पूरी कोशिश करेगा।
उत्तर प्रदेश की लोकसभा में कुल 80 सीटें हैं और इसीलिए यहां के विधानसभा चुनाव को लोकसभा का सेमीफाइनल तक कहा
जाता है। वहीं दूसरी तरफ यह अनुमान भी लगाए जा रहे हैं कि नोटबंदी का फैसला लिए जाने के बाद भी राज्य में सभी राजनीतिक दलों का चुनावी खर्च 40 बिलियन डॉलर तक पहुंचने वाला है।
इसके अलावा राज्य में इस फैसले के बाद अभी तक मिलीजुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। भारत की 65 फीसद आबादी 35 साल की उम्र से कम की है और मोदी सरकार के इस फैसले ने युवाओं के बीच काफी वाहवाही बटोरी है लेकिन बीजेपी की मुश्किलें सिर्फ इसी से ही आसान नहीं हो सकती। वहीं उत्तर प्रदेश कांग्रेस के सीनियर नेता प्रदीप माथुर का कहना है कि उन्हें अब नए सिरे से चुनावी रणनीति तैयार करनी है।
माथुर के मुताबिक बीजेपी के कॉर्पोरेट घरानों से करीबी संबंध हैं और राज्य में पार्टी के कार्यकर्ताओं और सदस्यों की बड़ी तादाद है, ऐसे में नोटबंदी के फैसले का असर बीजेपी के चुनाव प्रचार या उसकी रणनीति पर किसी भी तरह से नहीं पड़ने वाला। नरेंद्र मोदी अगर 2019 में दोबारा अपनी पार्टी की सरकार बनाना चाहते हैं तो देश की सबसे बड़ी चुनावी रणभूमि को जीतना भी उनके लिए जरूरी है।
राज्य सभा में बीजेपी अभी अल्पमत में है और पार्टी वहां पर तभी मजबूत हो सकती है जब वह उत्तर प्रदेश में मजबूत हो। कार्नियग एंडाउमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस (वाशिंगटन) संस्थान के साउथ एशियन ऐक्सपर्ट मिलन वैश्नव के मुताबिक, आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए बीजेपी ने यह अनुमान लगाया है कि इस फैसले से सभी को परेशानी होगी लेकिन बीजेपी आखिर में इससे मजबूत ही होगी।
इसके अलावा विभिन्न दलों के चुनाव प्रचार अभियानों की फंडिंग का आकलन करने वाले दिल्ली के सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के मुताबिक, बीजेपी का राज्य में अपनी जरूरतों का दो-तिहाई खर्च बिना कैश के भी पूरा हो जाएगा और दूसरी तरफ विरोधी दलों अपनी कैंपेनिंग के लिए 80 से 95 फीसद तक कैश पर निर्भर हैं।ऐसे में यह भी बीजेपी के लिए यह फायदे की स्थिति है।
कांग्रेस के प्रदीप माथुर के मुताबिक नोटबंदी से पार्टी को राज्य में छोटी-छोटी रैलियों से अपना काम चलाना होगा। वहीं खबरों के मुताबिक नोटबंदी के बाद कई राजनीतिक दलों ने पार्टी कार्यकर्ताओं को बैंकों की लंबी कतारों में नोट बदलने के लिए लगवा दिया है ताकि छोटे स्तर पर पैसा इक्ट्ठा कर किसी भी तरह की जांच से बच सकें।
वहीं दूसरी तरफ नोटबंदी का असर इवेंटमैनेजमेंट कंपनियों पर भी पड़ा है जिनका काम चुनावी समय पर काफी अच्छा रहता है। राकेश प्रताप रैलियों के लिए लाउडस्पिकर्स, एसी और सुरक्षा का इंतजाम मौहिया कराने का काम करते हैं। उनका कहना है कि इस बार बीजेपी के अलावा कोई भी पार्टी बड़ी रैली नहीं करना चाहती।
बसपा सुप्रीमो मायावती जो कि चुनाव में बीजेपी को बड़ी टक्कर दे सकती हैं उन्होंने नोटबंदी के समय को एक चुनाव में राजनीतिक फायदा लेने के लिए किया गया फैसला बताया है। बसपा के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक पार्टी इस बार बड़े पैमाने पर कैंपेनिंग करने के बजाए घर-घर जाकर लोगों से मिलने का काम करेगी। वहीं खबरों के मुताबिक केंद्र सरकार के नोटबंदी के फैसले से बीजेपी के कुछ विधायक
परेशान हैं। उनका अनुमान है कि इस फैसले से लोगों को हुई परेशानी से कहीं पार्टी के लिए लंबे समय तक परेशानी न खड़ी हो जाए।
