जम्मू-कश्मीर के केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद यहां की पुलिस पर बड़ी गाज गिरी है। पुलिस से अभियोजन (Prosecution) का अधिकार छिन लिया गया है। इसके पहले पुलिस अधिकारी मैजिस्ट्रेट की अदालत में बतौर पब्लिक प्रॉसिक्यूटर हाजिर हो सकते थे। लेकिन, अब उनसे यह सुविधा हटा ली गई है। ‘द हिंदू’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रॉसिक्यूटर विंग खत्म करने से पुलिस अधिकारियों के बीच हलचल मची हुई है। अधिकारियों का कहना है कि यह इसलिए किया गया है, ताकि उनसे उनका अधिकार छिना जा सके।

हालांकि, केंद्र सरकार के निर्देश पर जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने 30 अक्टूबर को एक आदेश जारी किया, जिसके मुताबिक अलग से ‘अभियोजन निदेशालय’ (Directorate of Prosecution) बनाने की बात है। लेकिन, गौर करने वाली बात यह है कि इसमें पुलिस अधिकारी शामिल नहीं होंगे। इसके पहले इस विंग की जिम्मेदारी डीआईजी रैंक के अधिकारी के पास होती थी।

जम्मू-कश्मीर पुलिस की वेबसाइट के मुताबिक प्रॉसिक्यूशन विंग के जरिए सभी विभागीय मुकदमों को निपटाया गया है। इसके अलावा याचिकाएं, सिविल सूट, विशेष अवकाश याचिकाएं, अवमानना संबंधी याचिकाएं, आपराधिक मुकदमा आदि की निगरानी की गई और उनका निपटारा किया गया। इस संबंध में 6 नवंबर को जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट की जम्मू डिविजन की बेंच के समक्ष एक पीआईएल दाखिल करके इस आदेश को चुनौती दी गई है।

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने इस संबंध में केंद्र शासित प्रदेश से एक हफ्ते के भीतर काउंटर एफिडेविट दायर करने को कहा है। अदालत ने देश के अन्य हिस्सों में स्थिति की जांच करने के लिए भी निर्देश भी दिया है। ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या अभियोजन पक्ष के रूप में पुलिस अधिकारियों को नियुक्त करने की प्रक्रिया और भी जगह मौजूद है या नहीं। द हिंदू को दिए साक्षात्कार में जम्मू-कश्मीर के डीआईजी दिलबाग सिंह ने कहा है कि प्रॉसिक्यूशन विंग पुलिस एक्ट 1983 के तहत काम करता है। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में पीआईएल दाखिल है। हमारे अधिकारी निचली अदालत में हाजिर होने का अधिकार रखते थे। हम अपने लिए एक लीगल विंग बनाए रखेंगे।