सुप्रीम कोर्ट ने जानेमाने वकील प्रशांत भूषण को अदालत की अवमानना का दोषी माना है। देश के मौजूदा और चार पूर्व प्रधान न्यायाधीशों को लेकर प्रशांत भूषण के दो ट्वीट को अदालत ने ‘आपराधिक अवमानना’ माना है। प्रशांत भूषण ने अपने पहले ट्वीट में प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे की तसवीर जारी की है, जिसमें वे एक महंगी मोटरसाइकिल पर सवार हैं। दूसरे ट्वीट में प्रशांत भूषण ने पिछले चार प्रधान न्यायाधीशों को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां की हैं। न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत प्रशांत भूषण को छह महीने तक की जेल की सजा हो सकती है। इसमें उनपर जुर्माना भी लगाया जा सकता है। इस कानून में प्रावधान है कि दोषी ठहराए गए व्यक्ति के माफी मांगने पर अदालत चाहे तो उसे माफ कर सकती है।
क्या कहता है कानून
न्यायालय का अवमानना अधिनियम, 1971 के अनुसार, न्यायालय की अवमानना का अर्थ किसी न्यायालय की गरिमा एवं उसके अधिकारों के प्रति अनादर प्रदर्शित करना है। इस अधिनियम में अवमानना को ‘सिविल’ और ‘आपराधिक’ अवमानना में बांटा गया है। सिविल अवमानना के तहत न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री, आदेश, रिट, अथवा अन्य किसी प्रक्रिया की जान बूझकर की गई अवज्ञा या उल्लंघन के मामले आते हैं। आपराधिक अवमानना के तहत न्यायालय से जुड़ी किसी ऐसी बात के प्रकाशन से है, जो लिखित, मौखिक, चिह्नित, चित्रित या किसी अन्य तरीके से न्यायालय की अवमानना करती हो। हालांकि, किसी मामले में निर्दोष साबित होने पर की गई टिप्पणी, न्यायिक कृत्यों की निष्पक्ष और उचित आलोचना एवं न्यायालय के प्रशासनिक पक्ष पर टिप्पणी करना न्यायालय की अवमानना के अंतर्गत नहीं आता है।
सजा का प्रावधान
सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट को अदालत की अवमानना के लिए सजा देने का अधिकार है। यह दंड छह महीने का साधारण कारावास या 2000 रुपए तक का जुर्माना या दोनों एक साथ हो सकता है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 129 और 215 में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट को ‘कोर्ट आॅफ रिकॉर्ड’ का दर्जा दिया गया है और उन्हें अपनी अवमानना के लिए किसी को दंडित करने का हक हासिल है। ‘कोर्ट आॅफ रिकॉर्ड’ का मतलब यह कि सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के आदेश तब तक प्रभावी रहेंगे जब तक कि उन्हें किसी कानून या दूसरे फैसले से खारिज न कर दिया जाए। वर्ष 1991 में सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश जारी किया था कि उसके पास न केवल खुद की बल्कि पूरे देश में हाई कोर्ट, अधीनस्थ न्यायालयों तथा न्यायाधिकरणों की अवमानना के मामले में भी दंडित करने की शक्ति है।
इस कानून की जरूरत क्यों
संविधान का अनुच्छेद 129 सुप्रीम कोर्ट को स्वंय की अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति देता है। अनुच्छेद 142 (2) अवमानना के आरोप में किसी भी व्यक्ति की जांच एवं उसे दंडित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट को सक्षम बनाता है। अनुच्छेद 215 सभी हाई कोर्ट को स्वंय की अवमानना के लिए दंडित करने में सक्षम बनाता है। न्यायालय का अवमानना अधिनियम, 1971 का उद्देश्य न्यायालय की गरिमा और महत्त्व को बनाए रखना है। अवमानना मामलों में अधिकार जजों को भय, पक्षपात और की भावना के बिना कर्त्तव्यों का निर्वहन करने में सहायता करते हैं। ‘दिल्ली ज्यूडिशियल सर्विस एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ और सीके दफ्तरी बनाम ओपी गुप्त जैसे मामलों में सुप्रीम अदालत यह कह चुकी है कि संविधान के अनुच्छेद 129 और 215 के तहत मिले उसके अधिकारों में न तो संसद और न ही विधानसभाएं कटौती कर सकती हैं।
अभिव्यक्ति का अधिकार बनाम अवमानना
संविधान का अनुच्छेद-19 भारत के हरेक नागरिक को अभिव्यक्ति एवं भाषण की आजादी प्रदान करता है। लेकिन न्यायालय का अवमानना अधिनियम, 1971 के जरिए न्यायालय की कार्यप्रणाली के खिलाफ बात करने पर अंकुश लगा दिया है। यह कानून व्यक्तिपरक है। लिहाजा, अवमानना की सजा का उपयोग न्यायालय द्वारा अपनी आलोचना करने वाले व्यक्ति को दबाने के लिए किया जा सकता है। न्यायालय का अवमानना अधिनियम, 1971 में वर्ष 2006 में धारा 13 के तहत ‘सत्य की रक्षा’ को शामिल करने के लिए संशोधित किया गया था।
इस संशोधन में दो बिंदु जोड़े गए और कहा गया कि अवमानना के मामले में मुजरिम की सच्चाई और नियत को भी ध्यान में रखा जाए।
क्या कहते हैं जानकार
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पूरे देश पर लागू होते हैं और सभी अदालतें और कार्यपालिका उन फैसलों को मानने के लिए बाध्य हैं। अवमानना का कानून अगर न हो तो कोई भी सुप्रीम कोर्ट या दूसरी अदालतों के फैसले नहीं मानेगा।
-प्रमोद कोहली, केंद्रीय प्रशासनिक पंचाट (कैट) के अध्यक्ष व सिक्किम हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश
अवमानना का कानून दुनिया के कई देशों में अप्रचलित है। भारत में भी इस पर गौर किए जाने जरूरत है। यह सुनिश्चित होना चाहिए कि अदालतों में इस कानून का इस्तेमाल किसी तरह की आलोचना को रोकने के लिए नहीं किया जाए।
-एपी शाह, पूर्व मुख्य न्यायाधीश, दिल्ली हाईकोर्ट
विदेश में क्या प्रावधान
इंग्लैंड में 1930 में अवमानना के कानून के तहत आखिरी फैसला आया था, जिसमें सजा सुनाई गई थी। इसके बाद किसी जज ने सजा नहीं सुनाई। 1969 में ब्रिटिश जज लॉर्ड डेनिंग के सामने मेट्रोपॉलिटन पुलिस कमिश्नर का मामला आया था, जिसमें उन्होंने कहा कि अदालत के पास अवमानना की कार्रवाई का अधिकार है, लेकिन वे इसका इस्तेमाल नहीं करेंगे। जज की निजता का मामला नहीं होता। उन्होंने कहा, ‘न तो हम आलोचना से डरते हैं और न ही इसका विरोध करते हैं।’ इसी तरह अमेरिका में जस्टिस ह्यूगो ब्लैक ने 1941 में एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत की अवमानना की बात कहकर लोगों की आवाज नहीं बंद होनी चाहिए। कनाडा, आस्ट्रेलिया में अदालतों की आलोचना की छूट है। ऑस्ट्रेलिया में भी इसी तरह का प्रावधान है।

