सीमा विवाद को लेकर भारत और चीन की सेनाओं के जनरलों के बीच बातचीत का दौर जारी है। लेफ्टिनेंट जनरल और मेजर जनरल स्तर की वार्ता हो चुकी है। दोनों देश ‘सकारात्मक हल’ निकालने की उम्मीद जता रहे हैं। लेकिन हकीकत है कि लद्दाख से 60 किलोमीटर दूर गालवान घाटी में भारत और चीन के बीच सीमा विवाद अब भी पूरी तरह से सुलझा नहीं है। कई क्षेत्र ऐसे हैं, जिनको लेकर जिच है। राजनयिक स्तर पर दोनों देश फूंक-फूंककर कदम रख रहे हैं। वरिष्ठ राजनयिकों का मानना है कि पूर्वी लद्दाख सीमा के क्षेत्रों का विवाद नाजुक है- सैन्य जमावड़े के लिहाज से और कूटनीतिक जोर-आजमाइश के लिहाज से भी।
कैसा और कितना अलग है तनाव
वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर दो परमाणु शक्ति संपन्न देशों की सेनाओं के बीच तनातनी के बाद दोनों देशों की सैन्य और राजनीतिक गलियारों में भी हलचल स्वभाविक तौर पर तेज हो गई है। पूर्वी लद्दाख का तनाव डोकलाम जैसा नहीं था, जब दोनों देशों की सेनाएं 73 दिनों तक एक दूसरे के सामने डटी रहीं थी। इसके पहले भी चीन ने 2013 में डेपसांग, 2014 में चुमुर और 2017 में डोकलाम में विवाद को जन्म दिया था, लेकिन इस बार सीमा पर तनाव इससे थोड़ा अलग है।
इस बार दोनों देशों के बीच तनाव एक से अधिक स्थानों पर है। जिसमें पैंगोंग त्सो लेक, लद्दाख की गालवान घाटी और गोगरा पोस्ट, सिक्किम में नाथूला पास शामिल है। चीन ने नाथूला पास और गालवान घाटी के कुछ इलाकों से अपनी सेना को हटा लिया है। लेकिन कई इलाकों से वे टस से मस होने को तैयार नहीं हैं। जानकारों का मानना है कि सर्वे आॅफ इंडिया के नए नक्शे में लद्दाख केंद्रशासित प्रदेश में गिलगित-बाल्टिस्तान और अक्साई चिन को दर्शाए जाने, इसके बाद मौसम पूर्वानुमान में गिलगित बाल्तिस्तान को भी शामिल किए जाने को लेकर चीन चिढ़ गया।
अक्सर गतिरोध क्यों
अक्सर सीमा पर चीनी आक्रामकता की खबरें आती हैं। सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, एलएसी पर भारतीय सेना चीन की तुलना में तीन से चार बार ज्यादा गश्त लगाती है। टकराव की जड़ सीमा विवाद का अनसुलझा होना है। पैदल गश्त होती है। उपग्रह के जरिए भी नजर रखी जाती है। एलएसी खुला इलाका है। यहां चीनी सेना आमने-सामने तैनात नहीं है। आमने-सामने तभी होती है, जब गतिरोध होता है।
क्या है भारत-चीन सीमा समझौता
2013 में सीमा सुरक्षा सहयोग समझौता (बीडीसीए) किया गया था। इसमें 1993 से लेकर तब तक की सारी बातें शामिल की गई थीं। चीन ने कई चीजों पर सहमति देने के बावजूद उन पर अमल नहीं किया। चीन को अपनी तरफ हॉटलाइन बनानी थी, नहीं हुआ। सीमा पर ढांचागत संरचना के मामले में चीन की सेना भारत से आगे है। कुछ साल पहले तक चीन बहुत कम वक्त में अपनी सेना के 22 डिवीजन (एक डिवीजन में 10 हजार जवान) को सीमा पर जुटा सकता था।
अब वह 32 डिवीजन जुटाने की क्षमता रखता है। दूसरी ओर, भारत अपनी जरूरत का 75 फीसद ढांचागत निर्माण पूरा कर सका है। अहम सड़क और रेलवे लाइन बनाने का काम शुरू किया गया है। हवाई मार्ग से अपनी सेना की आवाजाही की क्षमता बढ़ी है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बनाए गए सात हवाई पट्टियों को बहाल किया गया है और इनका आधुनिकीकरण भी किया गया है। जानकारों के मुताबिक, चीन की बराबरी लायक स्थिति में भारत अगले पांच-छह साल में पहुंचेगा।
चीन-पाकिस्तान का कारक तत्व
सीमा विवाद के एक पहलु के तौर पर बार-बार पाकिस्तान उभरकर सामने आता है। दो दिन पहले पाकिस्तान में चीनी दूतावास के प्रवक्ता ने भारतीय और चीनी सीमा पर सैनिकों के बीच गतिरोध को जम्मू कश्मीर में धारा 370 हटाए जाने से जुड़ा बताया। चीनी अधिकारी का नाम है वांग जियान फेंग, जिनके ट्विटर बायो के अनुसार, वे इस्लामाबाद में चीनी मिशन में प्रेस अधिकारी हैं।
उन्होंने ट्वीट कर चीन के राज्य मंत्रालय या मुख्य खुफिया एजंसी से जुड़े एक प्रभावशाली थिंक टैंक से जुड़े एक विश्लेषक का लेख पोस्ट किया है। इसमें कहा गया है कि भारत-चीन सीमा तनाव और कश्मीर की स्थिति में बदलाव के बीच गहरा संबंध है। वांग ने ट्वीट किया कि भारत ने कश्मीर की यथास्थिति को एकतरफा बदलने और क्षेत्रीय तनावों को जारी रखने के लिए चीन और पाकिस्तान की संप्रभुता को चुनौती दी है और भारत-पाकिस्तान संबंधों और चीन-भारत संबंधों को और अधिक जटिल बना दिया है।
क्या कहते हैं जानकार
हमें चीन की कूटनीतिक रणनीति को समझना होगा और उसी के हिसाब से जवाब देना होगा। एलएसी को लेकर जो अस्पष्टता है उसका हमें भी रणनीतिक फायदा उठाने की जरूरत है। तभी हम यथास्थिति को बनाए रखने के लिए चीन से मोल-तोल करने की हैसियत में होंगे।
-श्याम सरन, पूर्व विदेश सचिव
क्या कहते हैं जानकार
हमें रणनीतिक और ढांचागत तैयारियों पर जोर देना होगा। इससे हमें खुद को बचाने और हमला करने दोनों में मदद मिलेगी। मुख्य रूप से हमने हवाई मार्ग से अपनी सेना की आवाजाही की क्षमता बढ़ा ली है। ऐहतियात जरूरी हैं। चीनी सीमा से मिलने वाली सूचनाओं को हमें जरूरत के हिसाब से सार्वजनिक करनी चाहिए।
– जनरल (रिटायर) बिक्रम सिंह, पूर्व सेनाध्यक्ष
‘जैसे को तैसा रास्ता’ कितना मुफीद
जानकारों की राय में भारतीय सेना चीन के साथ लगी सीमा यानी एलएसी पर चीनी सेना को जैसे को तैसे जवाब दे सकती है और वो ऐसा करने में सक्षम है। लेकिन इसको लेकर सतर्कता बरती जा रही है। दूरगामी प्रभावों का आकलन किया जा रहा है। दरअसल, सेना में यह समझ बन गई है कि चीन के मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय और रक्षा मंत्रालय को ही फैसला लेना होता है, क्योंकि यहां टकराव बढ़ने की पूरी आशंका होती है।
यही कारण है कि कूटनीति पहलुओं पर भी विचार किया जाता है। दूसरी ओर, पाकिस्तान के साथ नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर स्थिति अलग है। यहां गोलीबारी आम बात है। कार्रवाई का फैसला सेना खुद करती है या बालाकोट जैसी कार्रवाई के लिए सरकार से अनुमोदन प्राप्त कर लेती है।
