रिपब्लिक मीडिया नैटवर्क के एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी को दो साल पुराने आत्महत्या के लिए उकसाने के एक मामले में अंतरिम जमानत मिल गई है। अंतरिम जमानत देते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अर्नब गोस्वामी के खिलाफ एफआईआर का मूल्यांकन करने से उनके खिलाफ आत्महत्या के लिए कोई अभियोग स्थापित नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि बंबई उच्च न्यायालय के आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में दायर याचिका पर फैसला करने के दिन से चार सप्ताह बाद तक पत्रकार अर्नब गोस्वामी की अंतरिम जमानत कायम रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायालय, निचली अदालत को राज्य द्वारा आपराधिक कानून के दुरुपयोग के प्रति सतर्क रहना चाहिए। उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय, जिला न्यायपालिका को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आपराधिक कानून नागरिकों को चुनिंदा तरीके से उत्पीड़ित करने का हथियार ना बनें। कोर्ट ने कहा “एक दिन के लिए भी किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता छीनना गलत बात है। उन नागरिकों के लिए इस अदालत के दरवाजें बंद नहीं किए जा सकते, जिन्होंने प्रथम दृष्टया यह दिखाया है कि राज्य ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग किया।”
कोर्ट ने कहा “जमानत आवेदन से निपटने में देरी संबंधी संस्थागत समस्याओं को दूर करने के लिए अदालतों की तत्काल आवश्यकता है।” कोर्ट ने कहा कि 11 नवंबर को गोस्वामी और अन्य को दी गई अंतरिम जमानत तब तक लागू रहेगी जब तक कि बॉम्बे हाई कोर्ट एफआईआर को रद्द करने के लिए दाखिल याचिकाओं पर फैसला नहीं सुनाता। हाई कोर्ट के फैसले के बाद उनकी जमानत 4 हफ्ते तक लागू रहेगी, ताकि अगर हाई कोर्ट उनकी दलीलों को खारिज कर दे, तो सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर सकें।
बता दें कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने अर्नब को जमानत देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद वो सुप्रीम कोर्ट गए थे। सुनवाई के दौरान जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर कोर्ट इस केस में दखल नहीं देता है, तो वो बर्बादी के रास्ते पर आगे बढ़ेगाय कोर्ट ने कहा कि ‘आप विचारधारा में भिन्न हो सकते हैं लेकिन संवैधानिक अदालतों को इस तरह की स्वतंत्रता की रक्षा करनी होगी वरना तब हम विनाश के रास्ते पर चल रहे हैं।’
