उत्तर बिहार के कई जिलों में इन दिनों इन्सेफ्लाइटिस से रोज कई बच्चों की मौत हो रही है। हालात ऐसे हैं कि मौत का आंकड़ा 120 को पार कर चुका है लेकिन इसकी रोकथाम और बचाव के लिए अभी तक ठोस कदम नहीं उठाए जा सके हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले 21 सालों में एक्यूट इन्सेफ्लाइटिस सिंड्रोम (AES) जिसे स्थानीय भाषा में चमकी नाम दिया गया है, उससे और जापानी इन्सेफ्लाइटिस (JE) से देशभर में 17 हजार से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। इंडियन जर्नल ऑफ डर्मेटोलॉजी में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक साल 1996 से लेकर दिसंबर 2016 तक देशभर में AES और JE से कुल 17,096 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि प्रभावितों की संख्या कई गुना ज्यादा है।
कलकत्ता मेडिकल कॉलेज के कम्यूनिटी मेडिसिन विभाग के डॉक्टर शुभांकर मुखर्जी ने रिसर्च में पाया है कि साल दर साल इन्सेफ्लाइटिस के मामले बढ़ते जा रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक साल 1996 में इस बीमारी (AES और JE) से कुल 2244 लोग प्रभावित हुए थे जिनमें से 593 की मौत हो गई थी। यह आंकड़ा 2016 के दिसंबर तक बढ़कर क्रमश: 11159 (प्रभावित) और 1289 (मौत) तक पहुंच गई। शोध के मुताबिक साल 2004 में इस बीमारी की चपेट में कम लोग आए, जब केवल 1714 लोग प्रभावित हुए और उनमें से मात्र 367 लोगों की मौत हुई लेकिन साल 2010 के बाद से इस बीमारी में बेतहाशा बढ़ोत्तरी देखने को मिली है। साल 2011 में AES और JE से मरने वालों की संख्या बढ़कर 1169 हो गई जो अगले साल 2012 में 1256, 2013 में 1273, 2014 में सर्वाधिक 1719 और 2015 में 1210 हो गई।
साल 2014 में बिहार के मुजफ्फरपुर और उसके आसपास के जिलों समेत यूपी के गोरखपुर और आसपास में सबसे ज्यादा इस बीमारी का प्रभाव था। उसके बाद सरकारी स्तर पर इसकी रोकथाम के लिए जन जागरूकता अभियान चलाने और मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) अपनाने का फैसला किया गया लेकिन बीमारी की न तो रोकथाम हो सकी और न ही मौत के आंकड़ों में उल्लेखनीय कमी आ सकी। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने मुजफ्फरपुर पहुंचकर पिछले दिनों 2014 की ही घोषणा को दोहराया है।
हालांकि, यह बात भी दीगर है कि 2017 में जिस तरह गोरखपुर और आसपास के 14 जिलों में जापानी इन्सेफ्लाइटिस (JE) ने कोहराम मचाया था और करीब 500 बच्चों को मौत की नींद सुला दिया था, वैसी स्थिति न तो 2018 में देखने को मिली और न ही 2019 में। यानी यूपी सरकार द्वारा उठाए गए कदमों से भी बिहार सरकार AES की रोकथाम के लिए कुछ सीख ले सकती है, ताकि बिहार के नौनिहालों को बचाया जा सके।
