भारत में अनाजों के जरिए लोग धीमे जहर का सेवन कर रहे हैं। ये दावा सरकारी वैज्ञानिकों ने कई चीजों में तो लिमिट से ज्यादा फंगस पाने के बाद किया है। दरअसल, रिसर्च के दौरान उन्हें मक्का, चावल, गेहूं और ओट्स में जियरालिनोन नामक हॉर्मोन खराब करने वाला फंगल टॉक्सिन (धीमा जहर) मिला है। वैज्ञानिकों ने इस बाबत खाद्य प्राधिकरण से कहा है कि अन्य देशों की तरह वह भी टॉक्सिन को लेकर सुरक्षा की सीमाएं तय कर दे।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखऊन में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च में वैज्ञानिकों के समूह ने चेताया है कि अनाजों में मिला हुआ जियरालिनोन यह बताता है कि शायद देश में ज्यादातर लोग अनाजों के माध्यम से इस फंगल टॉक्सिन का सेवन कर रहे हैं। चिंताजनक बात है कि यह टॉक्सिन यूरोपीय संघ द्वारा सुझाई गई सीमा से भी अधिक है।

वैज्ञानिकों ने अनाज के कुल 117 सैंपलों में से 70 में (यानी कि लगभग 60 फीसदी में) जियरालिनोन पाया। सैंपल में लिया गया मक्का, चावल, गेहूं और ओट्स शहर के बाजार स्थित दुकानों से लिया गया था, जहां इसे बहुतायत में लोग खरीदते हैं।

चावल के 17 फीसदी सैंपलों और गेहूं के लगभग 27 फीसदी सैंपलों में उन्हें यह फंगल टॉक्सिन मिला। कई शोध बताते हैं कि जियरालिनोन एंड्रोक्राइन सिस्टम को बुरी तरह से प्रभावित करता है। इस दौरान हॉर्मोन्स के सामान्य पैटर्न पर भी खासा प्रभाव पड़ता है।

रिसर्च टीम का नेतृत्व करने वाले मुकुल दास ने अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ को बताया, “हमने फिलहाल कुछ ही सैंपल देखें हैं, पर वे संकेत दे रहे हैं कि हमें अपने अनाजों को लेकर सतर्क होना पड़ेगा और देखना होगा कि कहीं उनमें भी तो जियरालिनोन नहीं है।”

दास और उनके सहयोगियों ने इस रिसर्च के दौरान पाई गई चीजों का जिक्र ‘जर्नल ऑफ फूड साइंस’ में भी किया है। वैज्ञानिकों का कहना था कि 150 डिग्री तक जियरालिनोन स्थिर रहता है। अनाज पकाने या गर्म करने के बाद भी ये फंगल टॉक्सिन उनमें बना रहता है।”