अगस्त्य नंदा की फिल्म ‘21: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल’ 1 जनवरी को रिलीज हो चुकी है। यह एक वरॉ ड्रामा फिल्म है, जिसमें अगस्त्य नंदा के अलावा दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र भी नजर आ रहे हैं। खास बात यह है कि यह धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म थी। फिल्म का निर्देशन श्रीराम राघवन ने किया है।

यह फिल्म 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की कहानी पर आधारित है, जिसमें सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के शौर्य और बलिदान को केंद्र में रखा गया है। अरुण खेत्रपाल को सबसे कम उम्र में परमवीर चक्र से नवाजा गया था। आज हम आपको उनके जीवन और वीरता की कहानी बताते हैं।

सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल का जन्म 14 अक्टूबर 1950 को पुणे, महाराष्ट्र में हुआ था। देशसेवा उनके खून में थी। उनका पूरा परिवार सेना से जुड़ा रहा और कई पीढ़ियों ने देश के लिए बलिदान दिए। उनके परदादा सिख खालसा सेना में थे और अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध लड़े थे। उनके दादा ने प्रथम विश्व युद्ध में तुर्कों के खिलाफ मोर्चा संभाला, जबकि उनके पिता ब्रिगेडियर एम.एल. खेत्रपाल द्वितीय विश्व युद्ध और 1965 के भारत-पाक युद्ध में शामिल रहे।

ऐसे माहौल में पले-बढ़े अरुण खेत्रपाल के लिए सेना की वर्दी ही सब कुछ थी। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई लॉरेंस स्कूल से की। इसके बाद वे नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) गए और फिर भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) से प्रशिक्षण पूरा किया। 13 जून 1971 को अरुण खेत्रपाल को 17 पुणे हॉर्स रेजीमेंट में कमीशन मिला। कमीशन के महज छह महीने बाद ही 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू हो गया। उस वक्त अरुण खेत्रपाल की उम्र सिर्फ 21 साल थी, लेकिन उनका साहस उम्र से कहीं बड़ा था।

1971 के युद्ध में उनकी भूमिका बैटल ऑफ बसंतपुर में देखने को मिली। 15 दिसंबर 1971 को पुणे हॉर्स रेजीमेंट को बसंत नदी पर ब्रिजहेड बनाने का आदेश मिला। लेकिन 16 दिसंबर को पाकिस्तान ने अपनी पूरी आर्मर्ड रेजीमेंट के साथ बड़ा हमला कर दिया। पाकिस्तान के पास भारी संख्या में टैंक थे, जबकि भारतीय सेना अपेक्षाकृत कम संसाधनों के साथ लड़ रही थी।

हालात बेहद चुनौतीपूर्ण थे। इसी दौरान स्क्वाड्रन कमांडर ने रेडियो पर मदद मांगी और अरुण खेत्रपाल तुरंत एक्शन में आ गए। उन्होंने अपनी टुकड़ी के साथ आगे बढ़ते हुए पाकिस्तानी हमलों का डटकर सामना किया। चारों तरफ भारी गोलीबारी हो रही थी, लेकिन अरुण खेत्रपाल ने एक-एक कर दुश्मन के टैंकों को नष्ट करना शुरू कर दिया।

अरुण खेत्रपाल उस वक्त सेंचुरियन टैंक ‘फैमागुस्ता’ पर सवार थे। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से 10 पाकिस्तानी टैंकों को नष्ट कर दिया। कुछ टैंक पूरी तरह तबाह हो गए, जबकि कुछ को भारतीय सेना ने कब्जे में ले लिया। कहा जाता है कि यह युद्ध भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे भीषण टैंक युद्धों में से एक था। इसी दौरान पाकिस्तान की एक गोला अरुण खेत्रपाल के टैंक को लगा और वह आग के गोले में बदल गया। ऊपर से उन्हें आदेश दिया गया कि वे टैंक छोड़ दें, लेकिन सामने से उनकी बुलंद आवाज आई- “नहीं सर, मैं टैंक नहीं छोड़ूंगा। मेरी गन अभी काम कर रही है और मैं दुश्मन को नहीं छोड़ने वाला।”

ये अरुण खेत्रपाल के आखिरी शब्द थे। उन्होंने आखिरी सांस तक लड़ते हुए दुश्मन के टैंक को तबाह किया, लेकिन जवाबी हमले में वे वीरगति को प्राप्त हो गए। महज 21 साल की उम्र में सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल ने देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी अद्वितीय बहादुरी का ही परिणाम था कि बैटल ऑफ बसंतपुर में भारत ने पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी और 1971 के युद्ध में ऐतिहासिक जीत दर्ज की। उनकी वीरता के सम्मान में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया।

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