पानीपत की तीन लड़ाइयों को भारतीय इतिहास को निर्णायक मोड़ देने वाला माना जाता है। वर्तमान हरियाणा में स्थित पानीपत दिल्ली से करीब 90 किलोमीटर दूर है। पांच नवंबर 1556 को यहां पानीपत की दूसरी लड़ाई हुई थी। एक तरफ रेवाड़ी का राजा हेम चंद्र विक्रमादित्य (हेमू) था तो दूसरी तरफ 14 वर्षीय अकबर की सेना थी। हेमू ने करीब एक महीने पहले अकबर के सेनापति तारदी बेग खान को हराकर दिल्ली पर कब्जा कर लिया था। कहा जाता है कि यह हेमू की लगातार 22वीं जीत थी। दिल्ली में हेमू की जीत की खबर सुनकर अकबर और उसके संरक्षक बैरम खान हेमू को चुनौती देने के लिए आए और दोनों सेनाएं 1526 के पानीपत के पहले युद्ध स्थल से थोड़ी देर पर आमने सामने आईं।

पानीपत की पहली लड़ाई में अकबर के दादा बाबर ने दिल्ली के शासक इब्राहिम लोदी को हराकर भारत में मुगल सल्तनत की नींव रखी थी। लेकिन बाबर का बेटा हुमायूं अपने पिता की तरह काबिल सिपहसालार नहीं था। उसके हाथ से जल्द ही दिल्ली और आगरा निकल गए। जुलाई 1555 में उसने दोबारा इनकी हुकूमत वापस पाई लेकिन जनवरी 1556 में उसका देहांत हो गया। हुमायूं की मौत के बाद उसका नाबालिग बेटा अकबर बादशाह और बैरम खां उसका संरक्षक बना। अकबर के बालिग होने तक बैरम खां ही मुगल सल्तनत का राजकाज देखता रहा।

मुगलों सेना से हुई लड़ाई में हेमू का तोपखाना पहले ही नष्ट हो गया था लेकिन उसके पास काफी बड़ी सेना थी। उसकी सेना में 30 हजार सैनिक और 500 हाथीसवार थे। लेकिन लड़ाई के दौरान निर्णायक मौका तब आया जब मुगल सेना का एक तीर हेमू की आँखों में लग गया और वो बेहोश हो गया। हेमू की सेना ने जब हाथी के हौदे पर अपने राजा को नहीं देखा तो उसका आत्मविश्वास हिल गया और भागने लगी। घायल हेमू को मुगल सेना ने पकड़ लिया।

बैरम खां ने 14 वर्षीय अकबर से घायल हेमू का सिर काटने के लिए कहा। अकबर ने घायल हेमू का सिर काटने से इनकार कर दिया। उसका बाद बैरम खां के कहने पर अकबर ने तलवार हेमू के सिर पर लगाकर उसे सौंप दी और फिर बैरम खां ने हेमू का सिर धड़ से अलग कर दिया। हेमू का सिर काबुल भेज दिया गया और उसका धड़ दिल्ली के एक दरवाजे पर लटका दिया गया। दूसरी तरफ हेमू जहां मारा गया था वहां उसके समर्थकों ने एक स्मारक बनाया। आज भी उस जगह पर हेमू समाधि स्थल मौजूद है। कहा जा सकता है कि पानीपत की दूसरी लड़ाई ने अकबर के करीब पांच दशक लंबे शासन की नींव रखी। मुगल सल्तनत 1707 में औरंगजेब की मृत्यु तक भारत का सबसे बड़ी शक्ति बना रहा। उसके ये धीरे धीरे कमजोर होता गया और 1857 में अंग्रेजों से हारने के बाद इसका अंत हो गया।