आमतौर पर देखा गया है कि त्योहार एवं कोई पर्व आते ही हवाई जहाज का किराया आसमान छूने लगता है। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक मामले में दखल दिया और कहा कि वह इस मामले में हस्तक्षेप करेगा और आदेश भी जारी करेगा।

जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की दो सदस्यीय बेंच ने केंद्र की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिस्टर जनरल अनिल कौशिक से कहा,”हम मामले में जरूर हस्तक्षेप करेंगे। कुंभ या अन्य त्योहारों पर इनका शोषण देखिए। जरा दिल्ली से प्रयागराज और जोधपुर के लिए किराया देखिए…सामान्य से तीन गुना अधिक है।”

जनहित याचिका पर कोर्ट कर रही सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट सामाजिक कार्यकर्ता एस लक्ष्मी नारायण की एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कहा गया कि हवाई किराए के निर्धारण में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और नागरिक उड्डयन क्षेत्र में यात्रियों की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एक स्वतंत्र और मजबूत नियामक योजना की मांग की गई।

17 नवंबर 2025 को इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, डीजीसीए और एईआरए से जवाब मांगे थे।

‘हर त्योहार में करते हैं शोषण’

सोमवार को केंद्र ने कोर्ट से और समय मांगा जिसपर जस्टिस विक्रमनाथ ने कहा कि इस तरह की शोषणकारी प्रथाएं केवल कुंभ तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने कहा, “यह केवल कुंभ ही नहीं बल्कि हर त्योहार में होता है।”

सुनवाई के दौरान दूसरे मामले में कोर्ट में मौजूद सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से हंसी-मजाक करते हुए कोर्ट ने कहा कि हम यह भी सुनिश्चित कर रहे कि अहमदाबाद (तुषार मेहता यहीं से आते हैं) के लिए हवाई किराया अधिक न हो, लेकिन वह हमारी परवाह नहीं करते।

याचिका में क्या गया?

याचिका में त्योहारों आदि के दौरान हवाई किराए में अधिक बढ़ोतरी के उदाहरणों का जिक्र किया गया और ऐसे अवसरों पर सरकार की निष्क्रियता पर प्रश्नचिन्ह लगाया गया।

याचिका में कहा गया, ‘सरकारें ऐसे परिस्थितियों में चुप नहीं रह सकती हैं। किराए संबंधी नियमों, रद्द करने की नीतियों, सेवा निरंतरता और शिकायत निवारक तंत्रों को विनियमित करने में सरकार की निष्क्रियता उसके संवैधानिक कर्तव्य का उल्लंघन है और इसमें तुरंत हस्तक्षेप किया जाना चाहिए।’

आगे कहा गया कि भारत में हवाई यात्रियों की संख्या बढ़ गई है, इस कारण हवाई यात्रा को जरूरी सेवा की कैटेगरी में रखा गया है। आगे याचिका में कहा कीमतों में विनिमित न करना संवैधानिक के आर्टिकल 21 के तहत जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।

मौलिक अधिकार का उल्लंघन

याचिका में आगे कहा गया, जब एयरलाइनों को कम समय में किराए में कई गुना बढ़ोतरी करने की अनुमित दी जाती है, तो यह आर्थिक रूप से कमजोर यात्रियों के सुरक्षित और समय पर आवागमन के अधिकार से वंचित करता है। इस तरह की मनमानी और अपारदर्शी मूल्य निर्धारण प्रणाली, जिस पर कोई बाध्यकारी नियमन लागू नहीं होता, संविधान के आर्टिकल 21 के तहत जीवन और गरिमा के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करते हैं।

मामले में पर अगली सुनवाई 23 फरवरी को होगी। आगे पढ़िए 48 घंटे के अंदर फ्लाइट टिकट कैंसिल करने पर कितनी चार्ज लगेगा? DGCA का बड़ा फैसला