कर्नाटक हाईकोर्ट ने आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रवि शंकर के खिलाफ आगे की जांच पर रोक लगा दी है। श्री श्री रवि शंकर का नाम बेंगलुरु में सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण के आरोप में दर्ज एफआईआर में आरोपी के रूप में शामिल किया गया था। जस्टिस एम नागप्रसन्ना आध्यात्मिक नेता द्वारा एफआईआर को रद्द करने की मांग वाली याचिका की सुनवाई कर रहे थे और उन्होंने कहा कि इस स्तर पर जांच रोकना उस खंडपीठ के पूर्व निर्देशों के विपरीत होगा जिसने सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया था।
अदालत ने इससे पहले जांच को रोकने से इनकार कर दिया था और कहा था कि रिकॉर्ड देखे बिना कोई भी आदेश पारित करना उचित नहीं होगा। विशेष लोक अभियोजक बेलियप्पा ने प्रस्तुत किया कि याचिकाकर्ता का नाम जनहित याचिका में प्रतिवादी के रूप में सामने आया था जिसके आधार पर यह अपराध दर्ज किया गया है। ऐसे में अपराध दर्ज करने में प्रतिवादियों BMTF की कोई गलती नहीं पाई जा सकती क्योंकि उन्होंने कानून की सभी प्रक्रियाओं का पालन किया है। उन्होंने तर्क दिया कि प्रतिवादियों बीएमटीएफ ने इस मामले में किसी भी प्रकार की प्रक्रियात्मक अनियमितता नहीं की है।
याचिकाकर्ता के विरुद्ध कोई आरोप नहीं- कर्नाटक हाईकोर्ट
अदालत ने कहा, “शिकायत को देखने से प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध कोई आरोप नहीं हैं। बिना किसी आरोप के याचिकाकर्ता को अपराध में नहीं फंसाया जा सकता जब तक कि विशेष लोक अभियोजक अगली सुनवाई की तारीख पर ऐसा कोई सबूत पेश न करें जिससे यह संकेत मिले कि याचिकाकर्ता कुछ कृत्यों में प्रत्यक्ष रूप से संलिप्त है।” आदेश में कहा गया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ जांच अगली सुनवाई की तारीख तक स्थगित रहेगी। इस मामले पर 21 जनवरी 2026 को अगली सुनवाई होगी।
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श्री श्री रवि शंकर पर क्या हैं आरोप?
रवि शंकर को जनहित याचिका में प्रतिवादी के रूप में नामित किया गया था। पिछले साल कर्नाटक भूमि राजस्व अधिनियम, 1964 की धारा 192A के तहत दर्ज एक मामले में आरोपी के रूप में नामित किया गया था। यह धारा सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे के लिए जेल और जुर्माने से संबंधित है। संबंधित एफआईआर बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन टास्क फोर्स पुलिस द्वारा उच्च न्यायालय में दायर एक जनहित याचिका में जारी निर्देशों के बाद दर्ज की गई थी। जनहित याचिका में बेंगलुरु दक्षिण तालुक के उत्तराहल्ली होबली के कग्गलीपुरा गांव के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में राजकालुवे पर निर्माण सहित सार्वजनिक भूमि पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण का आरोप लगाया गया था।
