कर्नाटक कांग्रेस में क्या एक बार फिर मुख्यमंत्री को बदलने की लड़ाई तेज होने वाली है? एक ताजा घटनाक्रम के बाद यह सवाल मजबूती के साथ सामने आ खड़ा हुआ है। खबरों के मुताबिक, कर्नाटक कांग्रेस के विधायकों का एक दल गुरुवार रात को दिल्ली पहुंच गया है। ये सभी विधायक डीके शिवकुमार के समर्थक हैं।
कर्नाटक में लंबे वक्त से प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के समर्थक अपने नेता को मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर रहे हैं। दिल्ली पहुंचे विधायकों में इकबाल हुसैन भी शामिल हैं।
इकबाल हुसैन ने इस साल जुलाई में बयान दिया था कि कर्नाटक में कांग्रेस के 100 विधायक डीके शिवकुमार का समर्थन करेंगे। तब उनके बयान को लेकर जबरदस्त चर्चा हुई थी और हालात को संभालने के लिए खुद शिवकुमार को आगे आकर इकबाल हुसैन की बात को खारिज करना पड़ा था।
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वोक्कालिगा समुदाय के विधायक भी हैं शामिल
एनडीटीवी के मुताबिक, वैसे तो ये विधायक बिजनेस ट्रिप पर आए हैं लेकिन कर्नाटक में जिस तरह की राजनीतिक चर्चाएं चल रही हैं, उसमें विधायकों का दिल्ली आना कई बड़े सवाल खड़े कर रहा है। इन विधायकों में कर्नाटक में ताकतवर वोक्कालिगा समुदाय के विधायक भी शामिल हैं। डीके शिवकुमार इसी समुदाय से आते हैं।
कर्नाटक में जब 2023 में कांग्रेस की सरकार बनी थी, तब भी शिवकुमार और सिद्धारमैया के समर्थक आमने-सामने थे। कांग्रेस ने सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री बनाया था और तब यह कहा गया था कि ढाई साल बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने का मौका शिवकुमार को मिलेगा। हालांकि कांग्रेस नेतृत्व की ओर से कभी भी आधिकारिक तौर पर ढाई साल वाले फार्मूले की पुष्टि नहीं की गई।
कांग्रेस के लिए कर्नाटक में राजनीतिक संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी हो गया है क्योंकि हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार में बेहद खराब प्रदर्शन की वजह से कार्यकर्ताओं में बेहद निराशा का माहौल है।
‘नवंबर क्रांति’ की अटकलों को किया खारिज
इस बीच कर्नाटक में लगातार ‘नवंबर क्रांति’ की अटकलें चल रही हैं। सिद्धारमैया ने ‘नवंबर क्रांति’ की अटकलों को मीडिया की उपज बताते हुए इसे पूरी तरह खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा है कि वह अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा करेंगे। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनकी स्थिति शुरुआत से ही मजबूत रही है और भविष्य में भी ऐसी ही बनी रहेगी।
मुख्यमंत्री ने दोहराया कि लोगों ने कांग्रेस को पांच साल के लिए सत्ता सौंपी है। यह पूछे जाने पर कि क्या वह पूरे पांच साल तक इस पद पर रहेंगे, सिद्धारमैया ने कहा, “इसका क्या मतलब है? ये अनावश्यक चर्चाएं हैं। मैंने पार्टी आलाकमान को बताया था कि ढाई साल बीतने जरूरी थे, जिसके बाद मंत्रिमंडल में फेरबदल पर विचार किया जा सकता है। इसके बाद ही सत्ता-बंटवारे के बारे में ये चर्चाएं शुरू हुईं।”
