मोटर व्हीकल एक्ट के क्लेम के एक मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने कहा है कि नौकरी मूवमेंट वाली हो तो 30% मेडिकल डिस्एबिलिटी को फंक्शनल डिस्एबिलिटी में शुमार किया जाए। हाईकोर्ट ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल के फैसले को खारिज कर याचिका दायर करने वाली नर्स के मुआवजे में वृद्धि का आदेश दिया।

दरअसल, नर्स बीना गोस्वामी ने मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 166 के तहत मुआवजे में वृद्धि को लेकर अपील दायर की थी। मामले के मुताबिक नर्स छह हजार रुपये प्रतिमाह के कांट्रेक्ट पर स्वास्थ्य महकमे में काम करती थीं। रांची से जमशेदपुर जाते समय एक ट्रक व कार की भिड़ंत में वो गंभीर रूप से जख्मी हो गईं। नर्स उस दौरान कार में सवार थीं। कार में सवाल एक शख्स की मौत भी हुई। हादसे की वजह से याचिकाकर्ता को स्थाई अक्षमता पैदा हो गई, क्योंकि घुटना टूट गया था।

हालांकि, मोटर व्हीकल ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता एक मैरामेडिकल वर्कर थीं। उन्होंने अपने इलाज पर 28,172 रुपये खर्च किए। तीन माह काम पर न जा पाने की वजह से उन्हें 18 हजार रुपये का नुकसान भी झेलना पड़ा। ट्रिब्यूनल ने इस क्षति पूर्ति को स्वीकार कर लिया। महिला को 30% डिस्एबिलिटी हुई, लेकिन कोई मुआवजा उन्हें नहीं दिया।

जस्टिस गौतम चौधरी ने अपने फैसले में कहा कि मामले में याचिका एक नर्स ने दायर की है। वो एक जगह खड़े होकर काम नहीं कर सकतीं। उनका काम अक्सर दौड़ने भागने वाला होता है। हादसे की वजह से उनके घुटने में फ्रैक्चर हुआ, जिससे 30% डिस्एबिलिटी पैदा हुई। लेकिन काम की प्रकृति को देखते हुए उनकी अक्षमता को फंक्शनल डिस्एबिलिटी में शुमार किया जाए।

कोर्ट ने माना कि हादसे के बाद पैदा हुई अक्षमता से उसकी अर्निंग पर असर पड़ा है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मुआवजे को लेकर अलग-अलग तरह की गणित हैं। लेकिन इस मामले में मासिक आमदनी, सालाना आमदनी के खोने, याचिकाकर्ता की उम्र और भविष्य को देखकर 40% की दर से मुआवजा तय किया जाए।